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सत्ता के ठेंगे पर जनता?

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जनतंत्र (लोकतंत्र) जनता पर आधारित शासन व्यवस्था होती है तथा किसी भी राष्ट्र में सत्ता द्वारा जन भावनाओं के अनुरूप काम करना ही उसकी लोकप्रियता को निर्धारित करता है। जनतंत्र में जनता को सिर्फ अपनी सरकार चुनने का ही अधिकार नहीं होता है अपितु समाज और राष्ट्रहित में काम न करने वाली सरकार को बदलने का भी अधिकार होता है। मगर आजादी के अमृतकाल में जनता को उसके सबसे बड़े संवैधानिक अधिकार से वंचित किया जा चुका है। वर्तमान दौर में सरकारें अगर जनमत से चुनी जा रही होती तो सत्ता में बैठे लोग इस बात का दावा नहीं कर सकते थे कि आप वोट चाहे जिसे दे सरकार तो भाजपा की ही बनेगी या फिर किसी भी समुदाय विशेष को यह कहकर धमका नहीं पाते कि उन्हें उनके वोट की जरूरत नहीं है। इसलिए अब किसी को भी इस मुगालते में रहने की जरूरत नहीं है कि देश में लोकतंत्र है और जब लोकतंत्र ही नहीं बचा है तो आपके संवैधानिक अधिकार की बात भी बेमानी हो जाती है। सत्ता का बेखौफ होना और मनमाने तरीके से फैसला लेना तथा किसी की भी बात को गंभीरता से न लेना स्वाभाविक ही है। सत्ता में बैठे लोगों को अब किसी भी विपक्ष दल के नेताओं और कार्यकर्ताओं के विरोध—प्रदर्शनों तथा जनता के आक्रोश और गुस्से का भी उस पर कोई असर नहीं दिखाई देता है। आम जनता और विपक्ष के नेता सब सत्ता के ठेंगे पर हैं। इन दिनों काकरोच जनता पार्टी को लेकर तमाम तरह की चर्चाएं हो रही है। इनका सत्ता पर क्या असर पड़ा है इस सवाल को लेकर भले ही देश का सोशल मीडिया चिल्लाता रहे कि सरकार डर गई मगर यह झूठ है। दो करोड़ कॉकरोच अगर पेपर लीक मुद्दे को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं और वह अपने पद पर बने हुए हैं या उन्हें हटाना भी सरकार जरूरी नहीं समझ रही है तो इसका सीधा अर्थ है कि सरकार को किसी भी बात या विरोध प्रदर्शन से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। ऐसा नहीं है कि यह कोई पहला मुद्दा है। देश में महिला पहलवानों के यौन शोषण के आरोपों से घिरे बृजभूषण के खिलाफ सत्ता में बैठे लोगों ने कब किसकी बात सुनी थी। देश के जो किसान अपनी जायज मांगों को लेकर सालों तक सड़कों पर पड़े रहे और 700 किसान मर—खप गए तब क्या सत्ता ने उनकी बात सुनने या मानने की जरूरत समझी थी। जन उपेक्षा के इस तरह के एक नहीं तमाम उदाहरण मौजूद है। बीते 12 सालों में अब तक किसी एक भी मंत्री ने किसी बात की नैतिक जिम्मेवारी ली और अपने पद से इस्तीफा दिया या सरकार ने उससे इस्तीफा देने को कहा। मणिपुर में जो कुछ भी हुआ वह इतना अधिक शर्मनाक था कि देश ही नहीं विदेशों तक इन घटनाओं को लेकर भारत की छवि धूल दूषित हुई लेकिन केंद्र सरकार पर क्या कुछ फर्क पड़ा? हरियाणा, महाराष्ट्र तथा बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनावों को लेकर भले ही कितनी भी आपत्तियां निर्वाचन आयोग और न्यायालय तक पहुंची हो लेकिन इस पूरी कवायद का सरकार पर क्या कोई फर्क पड़ा? महिलाओं को खुश करने के लिए सरकार नारी वंदन बिल भले ही ले आई हो लेकिन क्या उन्हें आरक्षण मिल सका? महिलाओं के वोट बटोरने की तमाम ऐसी योजनाएं लाकर जिसमें चुनाव के दौरान उनके खातों में सीधे रकम भेजी गई क्या उस पर कोई पाबंदी लगा सका? सौ बातों की एक सीधी बात यह है कि जनता सत्ता के ठेंगे पर है। कोई भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ऐसे में कॉकरोच भी क्या कर लेंगे? अभी सिर्फ उनके मीडिया अकाउंट बन्द किए गए हैं फिर भी नहीं मानेंगे तो जेल में डाल दिए जाएंगे। यही तो है इस देश का आज का लोकतंत्र।

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