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सूनी चौखटों को ‘अपनों’ का इंतजार

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  • पहाड़ के गांवों के बंद दरवाजों में कैद हैं अधूरी हंसी और सपने
  • पलायन ने पहाड़ से सिर्फ लोग नहीं, उसकी आत्मा भी छीन ली
  • रोजगार व बेहतर जिंदगी की तलाश में गांव हो गए हैं आज बूढ़े
  • खेत बंजर,पगडंडियां सुनसान व बुजुर्ग ताक रही अपनों की राह

देहरादून। पहाड़ की सुबह आज भी उतनी ही खूबसूरत होती है। सूरज की पहली किरण जब सीढ़ीनुमा खेतों पर पड़ती है तो लगता है जैसे प्रकृति ने सोने की चादर बिछा दी हो। हवा में आज भी बुरांश की खुशबू है और पगडंडियों में घास उगी है और आज भी वैसी ही हैं, लेकिन अब उनमें जीवन की आवाज नहीं बची।
कभी जिन गांवों में हर शाम चूल्हों का धुआं उठता था, जहां तिबारियों में बैठकर बुजुर्ग लोकगीत गाते थे, जहां बच्चे खेतों में दौड़ते थे, आज वहां सन्नाटा पसरा है। घरों के दरवाजों पर जंग लगे ताले लटक रहे हैं। कई मकानों की छतें टूट चुकी हैं। दीवारों पर उग आई काई मानो वक्त के बीतने का हिसाब दे रही हो। पलायन ने पहाड़ को धीरे-धीरे भीतर से खोखला कर दिया है। रोजगार, शिक्षा और बेहतर भविष्य की तलाश में गांवों के युवा शहरों की तरफ चले गए। पीछे रह गए बूढ़े मां-बाप, सूने आंगन और इंतजार करती आंखें।
उत्तराखंड के पहाड़ों में कभी इन गांवों में जीवन धड़कता था। सुबह महिलाएं घास और लकड़ी लेने जंगल जाती थीं, पुरुष खेतों में हल चलाते थे, बच्चे स्कूल की पगडंडियों पर दौड़ते थे। शाम होते ही चौपाल सजती थी और तिबारियों में लोकगीत गूंजते थे। अब वही गांव वीरान खड़े हैं। खेतों में झाड़ियां उग आई हैं और पगडंडियों पर अब केवल जंगली जानवरों के निशान दिखते हैं।
रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की तलाश में पहाड़ का युवा शहरों की ओर चला गया। देहरादून, दिल्ली, हल्द्वानी और चंडीगढ़ जैसे शहरों ने गांवों की रौनक अपने भीतर समेट ली। पीछे रह गए सिर्फ बूढ़े मां-बाप, जिनकी आंखें हर त्योहार पर दरवाजे की ओर टिक जाती हैं। वह आज भी उम्मीद करते हैं कि शायद इस बार बेटा लौट आएगा। शायद इस बार घर में फिर चूल्हा जलेगा। शायद सूनी पड़ी तिबारी में फिर हंसी सुनाई देगी।
पहाड़ के कई गांव अब भूतिया गांव कहलाने लगे हैं। वहां घर तो हैं, लेकिन उनमें जिंदगी नहीं है। टूटी छतों से बरसात टपकती है, दीवारों का पलस्तर झड़ चुका है और बंद कमरों में मकड़ियों ने अपने जाले बुन लिए हैं। ऐसा लगता है मानो घर भी अपने लोगों के लौटने की राह देखते-देखते थक गए हों। विडंबना यह है कि जिस पहाड़ ने देश को सैनिक, शिक्षक, वैज्ञानिक और अधिकारी दिए, वही पहाड़ आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। गांव खाली हो रहे हैं संस्कृति सिमट रही है और लोक परंपराएं धीरे-धीरे यादों में बदलती जा रही हैं।

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