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‘सत्ता’ के आगे झुकी ‘उम्र’

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  • मरोड़ा ग्राम पंचायत की युवा प्रधान और बुजुर्ग के पैर छूने वाली तस्वीर पर छिड़ी बहस
  • सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है तस्वीर
    युवा महिला प्रधान पर उठे सवाल, समर्थक आए सामने
  • लोकतंत्र, संस्कार व सत्ता के बदलते स्वरूप पर बहस

देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में मातृशक्ति और युवा नेतृत्व को लेकर अक्सर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कई बार सामाजिक मर्यादाओं और व्यवस्था के अंतर्विरोधों को उजागर कर देती है। हाल ही में पौड़ी गढ़वाल जिले की मरोड़ा ग्राम पंचायत से एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जिसने सोशल मीडिया से लेकर पहाड़ के राजनीतिक गलियारों तक एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
बता दें कि उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले की मरोड़ा ग्राम पंचायत इन दिनों अचानक चर्चा के केंद्र में आ गई है। वजह बनी एक वायरल तस्वीर, जिसमें ग्राम पंचायत की युवा महिला प्रधान वीरा रावत कुर्सी पर बैठी नजर आ रही हैं, जबकि उनके सामने दादा की उम्र का एक बुजुर्ग व्यक्ति झुककर उनके पैर छूता दिखाई दे रहा है। बताया जा रहा है कि मरोड़ा ग्राम पंचायत की युवा और पढ़ी-लिखी प्रधान वीरा रावत के पास गाँव के ही एक बुजुर्ग व्यक्ति किसी सरकारी काम या दस्तावेज पर हस्ताक्षर कराने पहुंचे थे। प्रत्यक्षदर्शियों और सामने आई जानकारी के अनुसार इस दौरान एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जहां बुजुर्ग व्यक्ति ने युवा महिला प्रधान के पैर छुए। इस घटना की तस्वीर और जानकारी जैसे ही सामने आई, यह पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई।
पहाड़ में जहां गाँव की बेटियों को पूजने और बड़ों से आशीर्वाद लेने की अटूट परंपरा है, वहां एक दादा की उम्र के बुजुर्ग द्वारा युवा प्रधान के पैर छूने की घटना ने लोगों को दो पक्षों में बांट दिया है। हालांकि इस मामले में कुछ लोग महिला प्रधान वीरा रावत के समर्थन में भी सामने आए हैं। उनका कहना है कि तस्वीर को एकतरफा तरीके से देखा जा रहा है। संभव है कि बुजुर्ग व्यक्ति ने स्वेच्छा से प्रधान पद का सम्मान करने के लिए ऐसा किया हो। समर्थकों का तर्क है कि लोकतंत्र में चुने गए जनप्रतिनिधि का सम्मान करना गलत नहीं माना जाना चाहिए। लेकिन सवाल केवल सम्मान का नहीं, बल्कि उस सामाजिक संदेश का भी है जो ऐसी तस्वीरें समाज में छोड़ती हैं। पंचायत व्यवस्था को गांवों की सबसे संवेदनशील लोकतांत्रिक इकाई माना जाता है, जहां प्रधान को जनसेवक की भूमिका में देखा जाता है। ऐसे में जब सत्ता और पद को लेकर दिखावे की तस्वीरें सामने आती हैं, तो लोगों के मन में असहजता पैदा होना स्वाभाविक माना जा रहा है।
यह विवाद महिला नेतृत्व को लेकर भी नई चर्चा खड़ी कर रहा है। कुछ लोग इसे महिला प्रधान को अनावश्यक रूप से निशाना बनाने की कोशिश बता रहे हैं। उनका कहना है कि यदि यही तस्वीर किसी पुरुष प्रधान की होती, तो शायद इतना बड़ा विवाद खड़ा नहीं होता। वहीं दूसरी ओर कई लोग इसे विनम्रता और सामाजिक संतुलन से जोड़कर देख रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर क्षेत्र के बु(िजीवियों, ग्रामीणों और सोशल मीडिया पर दो अलग-अलग दृष्टिकोण देखने को मिल रहे हैं। एक पक्ष का मानना है कि यह सम्मान वीरा रावत नामक एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि ग्राम प्रधान के संवैधानिक पद को दिया गया है। जब कोई व्यक्ति किसी प्रशासनिक या संवैधानिक पद पर बैठता है, तो वह व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। कई बार ग्रामीण अपनी अत्यधिक कृकृतज्ञता, काम हो जाने की खुशी या प्रशासनिक औपचारिकता के तहत पद के प्रति अपना सम्मान इस तरह प्रकट करते हैं। लोकतंत्र में पद की एक अपनी गरिमा होती है जो उम्र और जेंडर से ऊपर होती है।
दूसरा पक्ष इस घटना को उत्तराखंड की समृ( सांस्कृतिक परंपराओं के खिलाफ देख रहा है। उत्तराखंड के पहाड़ों में कुमाऊंनी और गढ़वाली संस्कृति के तहत बेटियां और बहुएं हमेशा पूजनीय रही हैं। गाँव के बुजुर्ग हमेशा युवाओं को आशीष देते हैं। आलोचकों का कहना है कि भले ही कोई व्यक्ति कितने ही बड़े पद पर क्यों न बैठ जाए, लेकिन सामाजिक जीवन में उसे अपनी उम्र, मर्यादा और पहाड़ के पारंपरिक संस्कारों का ध्यान रखना चाहिए। यदि बुजुर्ग भावुकतावश पैर छूने भी लगे, तो युवा प्रधान को शालीनता से उन्हें रोकना चाहिए था।
पहाड़ में युवा महिला नेतृत्व का उभरना निश्चित रूप से एक सकारात्मक संकेत है और वीरा रावत जैसी युवा प्रधानों से क्षेत्र को विकास की बड़ी उम्मीदें हैं। लेकिन इस तरह के मामलों से यह भी सीख मिलती है कि ग्रामीण भारत में सफल नेतृत्व वही माना जाता है, जो प्रशासनिक शक्ति के साथ-साथ लोक-परंपराओं और बुजुर्गों के सम्मान के बीच एक सही संतुलन बनाकर चले। यह मामला इस बात पर आत्ममंथन करने का अवसर देता है कि हम अपनी व्यवस्थाओं को मजबूत करते समय अपनी उन बुनियादी जड़ों और संस्कारों को न भूलें, जो हमारे पहाड़ की असली पहचान हैं।

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