प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगर आज भी यह समझ बैठे हैं कि वह देशवासियों को अगर यह कहेंगे कि भूत आ रहा है और तुम्हें खा जाएगा इसलिए सर के बल खड़े हो जाओ तो वह सर के बल खड़े हो जाएंगे? तो वह बहुत बड़े मुगालते में है वह समय अब बहुत पीछे छूट चुका है जब उनके कहने पर इस देश के लोगों ने घरों की छतों और बालकोनियों में खड़े होकर ताली और थालियां बजाई थी। उनके द्वारा अपने इमोशंस का इस्तेमाल करने की सभी सीमाएं पार हो चुकी हैं। वर्तमान समय में वह देश के लोगों से देश की डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए राष्ट्र प्रेम और राष्ट्रीय हितों की दुहाई देते हुए एक साल तक सोना न खरीदने पेट्रोल—डीजल की बचत करने के लिए मेट्रो में सवारी करने, खाघ तेल और उर्वरकों का इस्तेमाल न करने सहित विदेश घूमने न जाने तक तमाम जो बातें की जा रही है उनका लोग न सिर्फ मजाक बना रहे हैं बल्कि उनसे सीधे सवाल कर रहे हैं कि आज अगर देश की अर्थव्यवस्था इस बदहाल स्थिति में आकर खड़ी हो गई है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? देश के लोगों का कहना है कि डॉलर के मुकाबले रुपया 95 तो अब पहुंचा जब 85 पर था तब खाड़ी में युद्ध नहीं हो रहा था तब सरकार कहां सोई हुई थी? इजरायल ईरान युद्ध तो अभी 2 महीने पहले ही शुरू हुआ है क्या इन दो महीना में ही अर्थव्यवस्था डूब गई है जी नहीं इस अर्थव्यवस्था की बदहाली ऐसी होने में पूरे एक दशक का समय लगा है। जिसमें देश के लघु और मध्यम उघोगों को चौपट करने का काम सरकार ने किया है। नोटबंदी के एक तुगलकी फैसले ने देश के उघोग धंधों की ऐसी कमर तोड़ी कि वह फिर संभल ही नहीं सके। जब सत्ता में आए थे और विदेशों में जमा काला धन वापस लाने का और गरीबों के खातों में 15—15 लाख डालने का सफेद झूठ बोला था उसे अगर चुनावी शगुफा भी मान लिया जाए तो क्या हर साल 2 करोड़ रोजगार का वायदा भी शगुफा था अगर हां तो फिर इन शगूफो की फेरहिस्त इतनी लंबी हो चुकी है कि प्रधानमंत्री की किसी भी बात पर देश के लोग भला कैसे भरोसा कर सकते हैं। चुनाव दर चुनाव उनकी जीत को आधार बनाकर उनके अंध भक्तों का यह तर्क की अगर मोदी ने कोई काम नहीं किया है तो लोग उन्हें वोट क्यों दे रहे हैं? महज एक कुतर्क ही कहा जा सकता है क्योंकि अब पूरा देश जान चुका है कि भाजपा सरकार ने चुनावों को भी एक इवेंट मैनेजमेंट कैसे बना दिया है। देश के आम आदमी का जीवन बदहाली के जिस कगार पर आकर खड़ा हो गया है और शिक्षित बेरोजगारों की फौज बढ़ती जा रही है तथा आय के संसाधन घटते जा रहे हैं विदेशी निवेशक शेयर बाजार से अपनी पूंजी निकाल कर भागते जा रहे हैं रुपए की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोई कीमत शेष बची ही नहीं है और सरकार कृत्रिम तरीकों के सहारे बेरोजगारी तथा बढ़ती महंगाई की समस्याओं का समाधान खोज रही है उससे अब देश का कोई भला नहीं होने वाला है। आने वाले दिनों में महंगाई और बेरोजगारी का जो बम फटने वाला है इसका अंदाजा सत्ता में बैठे लोगों को हो चुका है। विकसित भारत का सपना बेचने वालों को पता है कि अभी तो सोना न खरीदने की अपील से शायद कुछ दिन काम चल जाएगा लेकिन आने वाले दिनों में उन्हें राष्ट्र के नाम सोना दान करने की कहीं अपील न करनी पड़ जाए? सगूफे और लफ्फे लफ्फाजी से आप लोगों को कितने समय तक मूर्ख बना सकते हैं सरकार चलाने के लिए जनता का विश्वास चाहिए होता है उसे देश के नेता अब खो चुके हैं। पीएम की यह अपील खुद इसका सबूत है कि उन्होंने देश को बर्बादी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है।




