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उत्तराखंड के पहाड़ों की संस्कृति में प्रकृति के साथ गहरे रिश्ते की अनोखी परंपरा

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ऊमी: अन्न, आस्था और प्रकृति का पर्व

  • नए गेहूँ का पहला दाना पहले देवता के नाम, फिर हमारे लिए बनता है प्रसाद
  • ‘ऊमी’ निकालने की परंपरा सिर्फ अन्न का भोग नहीं, बल्कि यह है एक सोच
  • प्रकृति के प्रति सम्मान, जीवन के प्रति आभार और समाज के प्रति जुड़ाव

देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में एक परंपरा है, जो आज भी पहाड़ के गांवों में निभाई जाती है। फाल्गुन की विदाई और चैत्र के आगमन के साथ ही जब खेतों में गेहूँ की बालियाँ सुनहरी आभा बिखेरने लगती हैं, तो ग्रामीण भारत की फिजाओं में एक खास तरह की सोंधी खुशबू घुल जाती है। यह खुशबू है ‘ऊमी’ की होती है।
पहाड़ में गेहॅू की कच्ची-पक्की बालियों को धीमी आंच पर भूनकर जब इन्हें हाथों से रगड़कर दाने निकाले जाते हैं, तो वह ‘ऊमी’ कहलाती है। पहाड़ के गांवों में नए अन्न का पहला दाना घर का कोई सदस्य तब तक नहीं चखता, जब तक इसे कुल देवता, क्षेत्रपाल या ग्राम देवता को अर्पित न कर दिया जाए। मान्यता है कि क्षेत्रपाल देवता ने कड़कती धूप और ठंड में फसल की रक्षा की है, इसलिए पहला हक उन्हीं का है।
उत्तराखंड के पहाड़ी जीवन में हर परंपरा के पीछे प्रकृति, आस्था और जीवन दर्शन का अद्भुत मेल दिखाई देता है। इस परंपरा के पीछे गहरी मान्यता है कि अन्न केवल मानव श्रम का परिणाम नहीं, बल्कि प्रकृति और दैवीय कृपा का संयुक्त वरदान है। इसलिए इसे सीधे उपभोग करने से पहले उस शक्ति को समर्पित करना आवश्यक माना जाता है, जिसने इसे संभव बनाया।
आज के दौर में तेजी से बदलती जीवनशैली और शहरीकरण के कारण ऐसी परंपराएं धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। खेतों से जुड़ाव कम हो रहा है और बाजार आधारित जीवन शैली बढ़ रही है। इसके बावजूद कई गांवों में आज भी ऊमी को उत्साह के साथ बनाकर उत्सव के रूप में मनाते हैं। आज जब दुनिया पर्यावरण संरक्षण की बात कर रही है, तब पहाड़ की यह परंपरा हमें सिखाती है कि प्रकृति के साथ संतुलन और सम्मान ही सच्ची समृ(ि का मार्ग है।

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गांवों के ऑगन में ऊमी की खुशबू
अग्नि में तपे इन दानों को जब गुड़ या शक्कर के साथ मिलाकर भगवान को भोग लगाया जाता है, तो वह ऊमी एक दिव्य प्रसाद में बदल जाती है। गाँव की चौपालों और आंगन में जब घर-घर से ऊमी की खुशबू आती है, तो मानों पूरी प्रकृति उत्सव मना रही होती है। बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि यह प्रसाद परिवार में सुख-शांति और अन्न के भंडार भरे रहने का प्रतीक है। आयुर्वेद के अनुसार )तु परिवर्तन के समय नया अनाज सीधे खाना भारी हो सकता है, लेकिन अग्नि में भूनने से यह सुपाच्य और हल्का हो जाता है। यह पाचन तंत्र को मजबूत करता है और शरीर को नई ऊर्जा प्रदान करता है।

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