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दून की सड़कों पर धरने—प्रदर्शन कब तक?

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  • कब जागेगा शासन—प्रशासन
  • वीआईपी कल्चर से जनता परेशान

देहरादून। सत्ता और सरकार से सवाल पूछना जहां मीडिया के लिए भी मुमकिन न हो वहां अगर कोई आम आदमी किसी मंत्री, विधायक या फिर किसी अधिकारी से सवाल पूछे वह भी भारी आक्रोश और गुस्से में तब उसके साहस को लोगों का सलाम करना स्वाभाविक है। बात चाहे देवभूमि के उस युवक की हो जो मोहम्मद दीपक के नाम से बीते दिनों चर्चाओं में रहा या फिर उस महिला की जिसने मुंबई की सड़कों मेंं सरेआम भाजपा के एक मंत्री और पुलिस अधिकारियों को लताड़ा जिसका वीडियो पूरे देश में अब वायरल हो रहा है।
देश के संविधान और कानून की किताबों में भले ही सभी नागरिकों के अधिकारों का उल्लेख स्पष्ट रूप से किया गया हो लेकिन सत्ता में बैठे नेताओं द्वारा इन नियम कानूनों की परवाह किए बिना कैसे इनका उल्घंन किया जाता है और आम जनता को किस तरह की मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं तथा पुलिस प्रशासन भी किस तरह उनकी कठपुतली बना रहता है यह सभी जानते हैं। साथ साथ यह भी जानते हैं उनके विरोध करने का नतीजा क्या हो सकता है। सरकारी काम में बाधा डालने की धाराओं में किसी को भी जेल पहुंचा देना उनके लिए कितना आसान होता है।
देश के कोने—कोने से आए दिन ऐसी तस्वीरे सामने आती रहती है। इन दिनों केंद्रीय सत्ता पर आसीन भाजपा ने सभी राज्यों में अपनी सरकारों व संगठन के लोगों से महिला आरक्षण के मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन के लिए उतारा हुआ है। सत्ताधारी दल बिल पास होने के बावजूद भी महिला आरक्षण में अड़गां डालने के लिये कांग्रेस के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं देश भर में इसे लेकर जो राजनीतिक तमाशा तो चल ही रहा है लेकिन सवाल यह है क्या सत्ता में बैठे लोगों द्वारा जनता को परेशान करना चाहिए?
बात दून कि की जाए तो यहां भी सीएम धामी और प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भटृ के नेतृत्व में सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किये जा रहे हैं। सड़कों की स्थिति जहां पहले से ही इतनी खराब है कि लोग घंटों घंटो जाम में फंसे रहते हैं उस समस्या को अगर सत्ताधारी दल ही बढा़ने पर उतर आए तो इसे क्या कहा जाएगा घंटाघर पर धरना प्रदर्शन नहीं होगा, पुतला दहन नहीं होगा ऐस्ले हाल चौक पर नहीं होगा गांधी पार्क पर भी नहीं होगा इसे लेकर सालों से प्रशासन कोशिशे कर रहा है। रिस्पना पुल चूना भट्ठा पर इसके लिए एक स्थल भी तय किया गया है लेकिन नतीजा ढाक के तीन पाथ ही रहा परेड ग्रांउड से लेकर सचिवालय और घंटाघर से लेकर सीएम आवास तक कभी भी कहीं भी इस तरह की राजनीतिक गतिविधियां आज तक भी जारी है। जब सत्ताधारी दाल भी इसमें शामिल होंगे तो रोकेगा कौन? रही बात जनता कि उसे दिक्कत होती है तो होती रहे। विधानसभा सत्र के दौरान तो लोग गली मोहल्ले की सड़कों पर घंटो भटकते रहते हैं उनकी समस्याओं से सरकार का क्या लेना देना है यह भारत है कोई नेपाल तो है नहीं जहां वीआईपी काफिले के लिए सड़कों को नहीं रोका जाए।

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