Home उत्तराखंड देहरादून नेताओं के अहम की शिकार कांग्रेस

नेताओं के अहम की शिकार कांग्रेस

0
27


राजनीतिक महत्वाकांशाएं नेताओं को भले ही कितना भी नाच नचाए उन्हें पूरा करने के लिए वह कई बार कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं खास बात यह है कि उनकी यह महत्वाकांक्षाएं राष्ट्र और समाज ही नहीं अपनी उस राजनीतिक पार्टी तथा दल से भी ऊपर हो जाती है जिस कंधे पर सवार होकर वह पीएम और सीएम तक की कुर्सियों तक का सफर तय करते हैं। स्वर्गीय नारायण तिवारी का उदाहरण देते हुए लोग कहते हैं कि अगर उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी न बनायी होती तो वह एक दिन देश के प्रधानमंत्री जरूर बने होते। 2012 के पहले उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस सत्ता में आई तो कांग्रेस ने उन्हें उत्तराखंड का सीएम बनाया उस दौर में हरीश रावत ने उनका भारी विरोध किया था भले ही वह पूरे 5 साल तक सीएम बने रहे लेकिन हरीश खेमे ने उन्हें हटाने के हर संभव प्रयास किये। हरीश रावत उस समय उनकी उम्र का हवाला देकर कहते थे कि जो पहाड़ की चढ़ाई न चढ़ सकता हो उसे सीएम नहीं बने रहना चाहिए। यह अलग बात है कि हरीश रावत की सीएम बनने की महत्वाकांशा 2013 में आई केदारनाथ त्रासदी के कारण पूरी हो गई जब विजय बहुगुणा को हटाकर हाई कमान ने इस राज्य की सीएम की कुर्सी पर उन्हें बैठा दिया गया। इससे पूर्व जब 2012 का चुनाव जीतने के बाद सीएम पद पर दिल्ली में फैसला हो रहा था तब हरीश रावत को सीएम न बनाए जाने पर उनकी नाराजगी भी उस हद तक पहुंच गई थी कि उनके समर्थक कांग्रेस छोड़ने पर आमादा थे। उस समय हरीश रावत यह एनडी तिवारी वाली गलती करते—करते बाल—बाल बचे थे। 2017 में सत्ता से बाहर हुई कांग्रेस बीते दो चुनावों में अपनी वापसी अगर नहीं कर सकी है तो इसके पीछे कांग्रेसी नेताओं की वह महत्वाकांक्षाएं ही है जिन्होंने कांग्रेसी नेताओं में आपस में ही सर फुटव्वल करा रखी है। 2027 के चुनाव से पूर्व अब इन कांग्रेसी नेताओं का फिर वैसा ही हाल देखा जा रहा है। दिल्ली में 6 नेताओं की सदस्यता लेने से शुरू हुआ यह विवाद अब उसे हद तक पहुंच गया है कि हरीश रावत के 15 दिन के अर्जित अवकाश पर जाने की घोषणा और उनके समर्थक खेमे के हरीश रावत तथा गोविंद सिंह कुंजवाल का अलग पार्टी बनाने और सामूहिक इस्तीफा देने तक की घोषणा से कांग्रेस में विभाजन की एक बार गहरी रेखा फिर खींच दी गई है। रामनगर क्षेत्र के एक नेता संजय नेगी को पार्टी मेंं शामिल न किए जाने से उपजे इस विवाद को आसानी से सुलझाया जा सकता था प्रदेश अध्यक्ष गोदियाल का कहना है कि संजय नेगी को आने वाले समय में पार्टी में शामिल किया जाना था फिर इस विवाद को इतना तूल दे दिया गया कि इसे हरीश रावत की उपेक्षा से जोड़कर इतना बड़ा बना दिया गया कि पार्टी में विभाजन से लेकर 2027 का चुनाव भी हारने की घोषणा हरीश रावत के समर्थक करने लगे। सवाल यह है कि जब अपने आप को कांग्रेस को समर्पित बताने वाले नेता ही जब कांग्रेस को हराने का दावा अभी से कर रहे हैं तो 2027 में कांग्रेस को कौन जिता सकता है। 8 अप्रैल को अब प्रदेश प्रभारी कुमारी श्ौलजा पांच दिवसीय दौरे पर उत्तराखंड आ रही हैं क्या उनके पास इन पार्टी नेताओं को एकजुट कर पाने का कोई फार्मूला होगा या वह हरीश रावत को स्थाई राजनीतिक विश्राम करने की सलाह देगी? क्योंकि वह भी अब उम्र दराज हो चुके हैं? एक बार फिर विभाजन के कगार पर खड़ी कांग्रेस को उसके महत्वाकांशी नेता किस मुकाम पर ले जाकर खड़े करते हैं आने वाला समय ही बताएगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here