आजादी के अमृत काल में आम आदमी की जिंदगी इतनी मुश्किलों में फंस जाएगी इसकी कल्पना शायद देशवासियों ने कभी नहीं की होगी? पीएम मोदी संसद में आए और कह कर चलते बने कि देशवासियों को एक बार फिर कोविड काल जैसे हालातो से निपटने के लिए तैयार रहना चाहिए। सवाल यह है कि सत्ता में बैठे लोगों ने आम आदमी को इस तरह के किसी भी संकट से बचाने के लिए क्या किया है? या फिर हर संकट और मुसीबताें को झेलने के लिए आम आदमी ही बना है। उसे ही मरना और खपना है? कोरोना काल की तरह डॉलर के मुकाबले रुपया रसातल में जा चुका है। महंगाई पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ चुकी है। बेरोजगारी अपने चरम पर है जिस माइक्रो इंडस्ट्रीज के सहारे गरीब और मजदूरों को रोटी कपड़ा और छत का जुगाड़ किसी तरह होता था वह बंदी की कगार पर है। शहरों से मजदूर अब अपने सामान को सर पर लादकर गांव की ओर पलायन कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब भोजन की व्यवस्था भी नहीं हो रही है तो वह भूखे पेट तो काम कर नहीं सकते हैं। रसोई गैस के दामों में बढ़ोतरी के बावजूद भी उन्हें गैस सिलेंडर नहीं मिल पा रहे हैं। फैक्ट्री और कारखानों में ताले पड़ते जा रहे हैं। महंगाई का आलम यह है कि खाघ तेल—घी ही नहीं सभी अन्य वस्तुओं की कीमतें आसमान पर जा चुकी है। एक लीटर वाली पैकिंग में अब सिर्फ 750 ग्राम तेल—घी मिल रहा है वह भी बढ़ी हुई कीमतों के साथ। दाल—सब्जियों तक के दाम आसमान छू रहे हैं। देश के तमाम शहरों से आने वाली पलायन की खबरो और तस्वीरों से यह साफ है कि देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से बदहाल हो चुकी है। तथा देश की जीडीपी में 30 फीसदी की भागीदारी रखने वाली माइक्रो और लघु उघोगों के चौपट होने से आम आदमी का जीवन और संकट में फंस गया है। रेहडी ठेेली सड़कों पर लगाने वालों से लेकर होटल और रेस्टोरेंटों के व्यवसाय से आजीविका चलाने वालों तक सब संकट में फंस चुके हैं। ईरान इजराइल युद्ध के कारण पैदा हुए इस संकट का समाधान कब तक हो पाएगा इसकी कोई समय सीमा भी नहीं है। युद्ध के कारण मिडल ईस्ट के एनर्जी उत्पादक देशों को सबसे बड़ा नुकसान इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए हमले से हुआ है। तमाम बड़ी तेल रिफाइनरियों को इतना बड़ा नुकसान हुआ है कि युद्ध बंद होने तथा आयात निर्यात की बाधा दूर होने के बाद भी हालात सामान्य होने में महीनो नहीं सालों का समय लग जाएगा। सत्ता में बैठे लोगों द्वारा अच्छे दिन लाने और आत्मनिर्भर भारत जैसे जितने भी दावे किए जाते रहे हैं वह सिर्फ जुमले ही साबित हुए हैं। देश का समाज और आम आदमी इस समय किस तरह के संकटों से चौतरफा घिर चुका है उसे अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा का कोई रास्ता भी नहीं मिल पा रहा है। नोटबंदी व जीएसटी तथा कोविड की त्रासदी की मार से पहले से परेशान आम आदमी अब जिस तरह के आर्थिक संकट के चक्रव्यूह में फंस चुका है वह अत्यंत ही चिंतनीय है। क्योंकि इससे बचाव का कोई रास्ता उसे नजर नहीं आ रहा है।




