September 5, 2026न सांसद, न विधायक, चुनावी मैदान में मामूली मौजूदगी और करोड़ों की बारिश चुनावी मैदान से गायब छोटी पार्टियों के खातों में छप्परफाड़ फंड 2023-24 में गैर-मान्यता प्राप्त दलों की तिजोरी हो गई है लबालब छोटे दलों के खातों में सैकड़ों करोड़, राजनीतिक सक्रियता भी नहीं नई दिल्ली। लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का अस्तित्व चुनाव, विचारधारा और जनता के बीच सक्रियता से जुड़ा होता है। लेकिन देश की चुनावी राजनीति में एक ऐसा विरोधाभास सामने आया है, जिसने राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। कुछ छोटे और गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के खातों में वित्त वर्ष 2023-24 के दौरान करोड़ों रुपये का चंदा पहुंचा, जबकि चुनावी राजनीति में उनकी मौजूदगी बेहद सीमित रही। चुनाव आयोग के रिकार्ड में ऐसे दलों की संख्या हजारों में रही है। इनमें से कुछ पार्टियों को मिले चंदे की मात्रा इतनी बड़ी बताई गई कि वह कई स्थापित राजनीतिक दलों की फंडिंग से भी आगे निकल गई।सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि इन दलों को कितना पैसा मिला। असली सवाल यह है कि जिस राजनीतिक संगठन की जमीन पर मौजूदगी दिखाई नहीं देती, उसके खाते में इतना पैसा पहुंचा कैसे? कई पड़तालों में ऐसे छह दलों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें बड़ी रकम चंदे के तौर पर मिली। लेकिन इनमें से कई दल चुनावी गतिविधियों में उसी अनुपात में सक्रिय नजर नहीं आए। यही विरोधाभास अब राजनीतिक फंडिंग की मौजूदा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। राजनीतिक दलों की आय और चंदे की जानकारी चुनाव आयोग के सामने प्रस्तुत की जानी होती है। आयोग अपनी वेबसाइट पर राजनीतिक दलों की उपलब्ध कराता है। भारत में किसी राजनीतिक संगठन का पंजीकरण होना और उसका चुनाव में प्रभावी राजनीतिक दल बन जाना दो अलग-अलग बातें हैं। लेकिन विशेषज्ञों की चिंता उन मामलों को लेकर है जहां राजनीतिक गतिविधि और आर्थिक लेनदेन के बीच भारी असमानता दिखाई देती है।ऐसे मामलों में यह आशंका उठती रही है कि कहीं कुछ संस्थाओं का इस्तेमाल केवल राजनीतिक चंदे के नाम पर धन के लेनदेन के लिए तो नहीं किया जा रहा। मीडिया रिपोर्टों और जांच एजेंसियों के सामने पहले भी ऐसे आरोप आए हैं कि कुछ चंदे का इस्तेमाल कथित तौर पर फर्जी राजनीतिक चंदे, टैक्स से जुड़ी गड़बड़ियों और धन को इधर-उधर करने के लिए किया गया। हालांकि किसी विशेष दल को मनी लान्ड्रिंग, हवाला या टैक्स चोरी में शामिल मान लेना तब तक उचित नहीं होगा जब तक जांच या न्यायिक प्रक्रिया से इसकी पुष्टि न हो।राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता का सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राजनीतिक दल लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रमुख संस्थान हैं। वित्त वर्ष 2023-24 में राष्ट्रीय दलों ने भी 20 हजार रुपये से अधिक के दान के रूप में हजारों करोड़ रुपये घोषित किए थे। एके विश्लेषण के अनुसार राजनीतिक दलों की फंडिंग का बड़ा हिस्सा बड़े दानदाताओं और विभिन्न औपचारिक चैनलों से आता रहा है। लेकिन जब कोई छोटा दल अचानक बड़ी रकम प्राप्त करता है और उसके बाद उसके चुनावी प्रदर्शन, संगठनात्मक गतिविधियों अथवा सार्वजनिक उपस्थिति में उसका कोई स्पष्ट प्रतिबिंब नहीं दिखता, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है यह पैसा राजनीति में गया या सिर्फ राजनीतिक दल के खाते से होकर गुजरा?राजनीतिक फंडिंग की व्यवस्था का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को संसाधन उपलब्ध कराना है, न कि ऐसी वित्तीय संरचनाओं को जन्म देना जिनका वास्तविक राजनीतिक उद्देश्य ही अस्पष्ट हो जाए। हाल के वर्षों में संदिग्ध राजनीतिक चंदे को लेकर जांच एजेंसियों की कार्रवाई भी सामने आई है। यह पूरा विवाद राजनीतिक व्यवस्था के सामने एक असहज सवाल रखता है। क्या राजनीतिक दल केवल चुनाव लड़ने वाली संस्थाएं हैं या वह वित्तीय लेनदेन का भी माध्यम बन सकते हैं? अगर किसी दल को करोड़ों रुपये मिलते हैं, तो जनता को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि पैसा किसने दिया, क्यों दिया, किस उद्देश्य से दिया गया और उसका इस्तेमाल कहां हुआ।राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता केवल लेखा-जोखा नहीं है। यह सीधे-सीधे लोकतंत्र में जनता के भरोसे का सवाल है। चुनाव में हार-जीत लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन अगर चुनावी राजनीति से लगभग गायब संगठन करोड़ों की आर्थिक गतिविधियों के केंद्र में दिखाई देने लगें, तो फिर चुनाव आयोग, आयकर विभाग और अन्य नियामक संस्थाओं के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा होता हैकृ आखिर ये राजनीतिक दल जनता की आवाज हैं या पैसे के उस खेल का पर्दा, जो राजनीति के नाम पर चलता है? 1700 करोड़ रुपये का चंदावित्त वर्ष 2023-24 में देश की कुछ छोटी क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां चंदा जुटाने के मामले में बड़े-बड़े स्थापित दलों से आगे निकलती दिखाई देती हैं। हैरानी की बात यह है कि इन दलों के पास न कोई लोकसभा सांसद है और न कोई विधायक। चुनावी राजनीति में भी इनकी सक्रियता बेहद सीमित रही है, लेकिन इनके खातों में करोड़ों रुपये का चंदा पहुंचा। आंकड़ों के मुताबिक, गुजरात की आम जनमत पार्टी को करीब 620 करोड़ रुपये, सत्यवादी रक्षक पार्टी को 330 करोड़ रुपये और न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी को करीब 200 करोड़ रुपये चंदा मिला। वहीं स्वतंत्र अभिव्यक्ति पार्टी, जिसे एक पेपर पार्टी के रूप में बताया गया है, को 219 करोड़ रुपये, भारतीय नेशनल जनता पार्टी को 191 करोड़ रुपये और गरीब कल्याण पार्टी को करीब 138 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। यानी इन छह दलों को मिलाकर करीब 1700 करोड़ रुपये का चंदा मिला। इसके मुकाबले कांग्रेस को इसी अवधि में करीब 288 करोड़ रुपये चंदा मिलने का आंकड़ा सामने रखा जा रहा है।