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नीतीश की बिहार से विदाई

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दो दशक तक बिहार की राजनीति के शीर्ष पर रहने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जिन्हें लोग सुशासन बाबू के नाम के साथ—साथ पलटू राम के नाम से भी जानते हैं अब बिहार के मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे। भले ही नीतीश कुमार ने अभी सीएम के पद से इस्तीफा न दिया हो लेकिन राज्यसभा के नामांकन पत्र भरने के साथ उनकी बिहार से विदाई तय हो गई वहीं बिहार चुनाव में सबसे अधिक सीटें जीतने के बाद भी अपना मुख्यमंत्री न बना पाने वाली भाजपा की यह मुराद भी पूरी होती दिख रही है कि देश के एक राज्य की सत्ता पर भाजपा अपना कब्जा करने में सफल हो गई है। नीतीश कुमार की बिहार से हुई विदाई की संभावनाएं भले ही बहुत पहले से दिखाई दे रही थी लेकिन चुनाव के दौरान 25 से 30 साल फिर नीतीश कुमार के स्लोगन से यह किसी ने नहीं सोचा था की 2026 में ही यह हो जाएगा। हैरान करने वाली बात यह है कि नीतीश कुमार जिन्हें राजनीति का पुरोधा मानने वाले पीएम मैटेरियल बताते थे उन्हें नीतीश कुमार ने राज्यसभा जाने का जो कारण अपनी एक पोस्ट में बताया है कि वह राज्य विधानसभा व परिषद के सदस्य रहे तथा लोकसभा के सदस्य भी रहे उनकी इच्छा थी कि राज्य सभा सदस्य भी रहे हैरान करने वाला है आज तक तो किसी पदासीन मुख्यमंत्री ने राज्यसभा जाने के लिए सीएम की कुर्सी छोड़ी नहीं है। फिर नीतीश कुमार को इस अभिलाषा के पीछे क्या कारण है ? इसका जवाब उनके नामांकन के समय देश के गृहमंत्री अमित शाह की उपस्थिति की तस्वीरें देती है। जब मजिस्टे्रेट कार्यालय में नीतीश के साथ वह बैठे हैं। यह नीतीश कुमार का अपना फैसला नहीं बल्कि भाजपा का फैसला है जो चुनाव के समय से ही नहीं बीते 16 सालों से बिहार में अपनी सरकार व अपना सीएम बनाने की योजना बनाती रही है। नीतीश कुमार के राज्यसभा में जाने के फैसले को भले ही कुछ लोग केंद्र सरकार के अपने मजबूती के तौर पर देख रहे हो लेकिन इसके पीछे भी भाजपा की वह गूढ़ राजनीति छपी है जिसमें वह देश के 28 राज्यों में से टू थर्ड राज्यों में अपनी सरकार बनाकर संविधान बदलने का वैधानिक अधिकार हासिल करने के प्रयास में जुटी हुई है। इस दिशा में बिहार में वह पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनाकर एक और कदम आगे बढ़ा चुकी है लेकिन सीएम की कुर्सी पर भाजपा और दो उपमुख्यमंत्री जेडीयू के होंगे। नीतीश कुमार भले ही अपने कौशल से बीते समय में भाजपा को मात देते आए हो लेकिन उनकी बिहार से विदाई ने यह भी तय कर लिया है कि अकाली दल और शिवसेना की तरह से अब भाजपा जेडीयू को भी अस्तित्व विहीन बनाने में सफल हो चुकी है। भाजपा के लिए अब जेडीयू सहयोगी दल नहीं अपनी पार्टी ही हो जाएगी। यह सभी जानते थे कि बीजेपी बिहार में अपने बूते यह लक्ष्य हासिल नहीं कर सकती थी इसलिए भाजपा ने बिहार के सबसे मजबूत स्तंभ नीतीश कुमार को इसके लिए चुना। कई बार भाजपा का साथ छोड़ने और जोड़ने के खेल का अब पटाक्षेप हो चुका है लेकिन नीतीश के फैसले से नाराज बिहार के लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि अपने 20 साल के शासन में नीतीश ने बिहार को क्या दिया? सिर्फ अपने राजनीतिक हित साधने के सिवाय?

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