ढाई माह बाद भी किमाड़ी में सड़क नहीं बनी
प्रेम नगर में नदी पर बना पुल कब होगा ठीक
देहरादून। आपदा प्रबंधन में अव्वल होने का ढोल पीटने वाली सरकार और मुख्यमंत्री को एक बार फिर उन क्षेत्रों का दौरा जरूर करना चाहिए जिन क्षेत्रों में आपदा के समय वह गए थे और लोगों को हर संभव सहायता तथा निर्माण कार्य कराने का भरोसा दिया गया था।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के पास अगर समय की कमी है और व्यस्तता ज्यादा है तो वह कम से कम सीएम आवास के आसपास तथा राजधानी दून के आस—पास के क्षेत्रों में जाकर ही एक बार देख ले कि आपदा के बाद कितना काम किया गया है और अगर किया भी गया है तो कितना संतोषजनक है। मुख्यमंत्री आवास से महज डेढ़—दो किलोमीटर दूर किमाड़ी क्षेत्र में सितंबर माह में अतिवृष्टि से सड़कों को भारी नुकसान हुआ। कुछ सड़के तो पूरी तरह से वास आउट हो गई और क्षेत्रीय लोगों के आने—जाने का रास्ता पूरी तरह से बंद हो गया था वहीं कई पुल व पुलिया भी क्षतिग्रस्त हो गए थे। आपदा के बाद खुद मुख्यमंत्री धामी काबीना मंत्री गणेश जोशी के साथ हालात का जायजा लेने पहुंचे थे तथा क्षेत्र वासियों को शीघ्र सड़क निर्माण का भरोसा दिलवाया गया था। आपदा के बाद यहां बुलडोजर चलाकर समलतलीकरण कर आने जाने का रास्ता तो बना दिया गया लेकिन आज तक यहां पक्की सड़क का निर्माण नहीं हो सका है।
वहीं अगर प्रेम नगर में नदी पर बने पुल के क्षतिग्रस्त होने पर बात की जाए तो इस पुल की अहमियत को समझते हुए इसे बहुत पहले बन जाना चाहिए था हरियाणा और पंजाब के सारे यातायात का जरिया होने वाला यह पुल चकराता क्षेत्र वासियों के आवागमन का एकमात्र रास्ता है। इस पुल के आसपास कच्चे रास्ते तो बनाकर आवागमन का रास्ता सुलभ कर लिया गया जहां से अभी भी हजारों वाहन हर रोज गुजर रहे हैं और क्षेत्र के लोग धूल फांक रहे हैं। लेकिन पुल की मरम्मत का काम अभी तक शुरू नहीं किया जा सका है। राजधानी के आसपास वह चाहे मालदेवता क्षेत्र में हुई तबाही हो या फिर सहस्त्रधारा क्षेत्र में किसी भी क्षेत्र में कोई निर्माण कार्य नहीं हो सका है जबकि आपदा को दो से ढाई माह का समय बीत चुका है। सवाल यह है कि जब राजधानी दून और उसके आसपास के क्षेत्रों के हालत यह है तो बाकी दूरस्थ क्षेत्रों में क्या कुछ हाल होगा? आसानी से समझा जा सकता है। सत्ता में बैठे लोग अगर यह मानें बैठे हैं की आपदा काल गया और सब ठीक हो गया तो इस मानसिकता से कुछ भी ठीक नहीं हो सकता है जो आपदाजनित समस्याओं को अभी भी झेल रहे हैं सरकार के रवैये से तो उनकी नाराजगी और गुस्सा लगातार बढ़ रहा है। यह सरकार का आपदा प्रबंधन फेल नहीं तो और क्या है?




