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मौतों का जिम्मेवार कौन?

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बीते कल दिल्ली के दिल पर जो धमाका हुआ है उस धमाके में कितने लोगों ने अपनी जान गंवाई या फिर कितने लोग अस्पतालों में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं हम उसकी संख्या पर नहीं जाना चाहते हैं क्योंकि हर किसी की जिंदगी की क्या अहमियत है उसका मोल उसके अपने परिजन ही जान समझ सकते हैं। हां वह दिल्ली हो या फिर पहलगाम या पुलवामा हो या उरी। देश में जो कुछ भी हो रहा है वह अत्यंत ही दुखद, त्रासद और चिंतनीय है। हर घटना के बाद एक ही सवाल उठता है कि इन निर्दाेष लोगों की हत्या का जिम्मेवार कौन है? सत्ता में बैठे लोग चाहे ऐसी घटनाओं का जवाब किसी सर्जिकल पर अपनी पीठ थपथपा कर दे या फिर ऑपरेशन सिंदूर जैसे हमलो से दे। जबकि इन प्रतिक्रियाओं की समस्या का समाधान पर कोई असर कभी होता हुआ ही नहीं दिखता है तो फिर इसका क्या कोई फायदा है? भारत अब किसी से डरता नहीं है, जो छेड़ता है उसे छोड़ता नहीं है घर में घुसकर मारता है जैसे जुमले गढ़ने वालों के पास शायद इस सवाल का भी कोई जवाब नहीं होगा कि उरी, पुलवामा और पहलगाम तथा दिल्ली में घुसकर उन्हें कौन मार रहा है जो तुम्हें तुम्हारे घर में मार रहे हैं उन्हें आज तक तुम कितना पकड़ पाए हो। अगर अपवाद के तौर पर मुंबई हमले के एक आरोपी को पकड़े जाने के बाद आपकी पुलिस फोर्स और जांच एजेंसियां आज तक क्या किसी घटना के आरोपियों को तलाश कर पाई है? हर बार जांच होगी जांच कर रहे हैं आरोपियों को बक्शा नहीं जाएगा। सुनते—सुनते लोग परेशान आ चुके हैं। अभी सिर्फ दो ही दिन गुजरे है जब फरीदाबाद में एक घर से 2563 किलो विस्फोटक बरामद हुआ था। सवाल यह है कि जब सुरक्षा एजेंसियों के पास इस बात का पक्का इनपुट था कि राजधानी दिल्ली और उसके आसपास का क्षेत्र आतंकियों के निशाने पर है इसके बाद भी कल दिल्ली में इतनी बड़ी घटना का हो जाना सत्ता, सरकार और सुरक्षा बलों की बड़ी नाकामी नहीं है तो और क्या है? खास बात यह है कि इन निर्दोषों की हत्याओं की जिम्मेदारी देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री लेंगे? भाजपा के सभी नेता अपने भाषणों में कांग्रेस के कार्यकाल में क्या होता था? इसकी बखिया उधेड़ने में लगे रहते हैं लेकिन भाजपा के शासनकाल में किसी भी घटना या दुर्घटना की जिम्मेवारी लेने की कोई रीति रिवाज नहीं है। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के समय में इस तरह की घटनाएं नहीं होती थी। लेकिन तब शिवराज पाटिल जैसे गृहमंत्री भी थे जो जिम्मेदारी भी लेते थे और अपना मंत्री पद भी त्याग देने का साहस भी दिखाने में पीछे नहीं रहते थे। आतंकवाद की इस लड़ाई में कांग्रेस ने एक नहीं अनेक कुर्बानियां दी है। भाजपा के नेता तो इस तरह की आपदाओं में भी अवसर की तलाश करने से बाज नहीं आती। ऑपरेशन सिंदूर जो पहलगाम के हत्याकांड के बाद सरकार ने डिजाइन किया था उसे लेकर उसकी जिस तरह बुरी किरकिरी हुई थी उसे पूरे देश ने देखा था इस ऑपरेशन का नाम सिंदूर रखने से लेकर भाजपा नेताओं द्वारा हर घर में सिंदूर बांटने के कार्यक्रम तक, जिसे जनता के विरोध पर वापस ले लिया गया था क्या—क्या नहीं हुआ था? कुछ लोगों के मर जाने से सत्ता में बैठे ऐसे लोगों को क्या फर्क पड़ता है उनके लिए तो सत्ता में बने रहना ही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो चुका है। गृहमंत्री बीते दिनों से पटना में डेरा जमाये बैठे थे। अब दिल्ली आ गए हैं और सब कुछ ठीक कर देंगे। इस घटना की जांच में अब तक यही सामने आया है कि यह एक आत्मघाती हमला है और इसके तार फरीदाबाद मॉड्यूल से जुड़ते दिख रहे हैं? खैर जांच होती रहेगी और हाई लेवल बैठक भी होती रहेगी जिन्हें इसकी जद में आकर मरना था मर चुके हैं। हमारे पास भी उनकी मौत पर शोक संवेदना जताने के लिए और क्या है। ईश्वर इस हादसे के शिकार लोगों की आत्मा को शांति प्रदान करें। भले ही सत्ता संवेदनशील हो न हो इस घटना को लेकर देशवासी दुखी है और चिंतित है।

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