नफरत का समाज

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देश की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानियों ने तथा देश का संविधान लिखने वालों ने शायद यह कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि आने वाले समय में इस देश का समाज इस हद तक असहिष्णु हो जाएगा कि लोग धर्म और जातिगत आधार पर हिस्सो हिस्सो में बंट जाएंगे और वह न संविधान की बात सुनेंगे न ही संवैधानिक व्यवस्थाओं को मानेंगे। कल देश के सर्वाेच्च न्यायालय में जिस तरह से एक अधिवक्ता राकेश किशोर ने चीफ जस्टिस बी.आर. गवई पर जूता उछालने की कोशिश की गई और सनातन यह अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान का नारा लगाया गया वह इस देश की वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं की हकीकत बयां करने के लिए काफी है। सवाल यह है कि जब देश की सर्वाेच्च न्यायालय जैसी संवैधानिक संस्था का हम इस तरह से अनादर होते देख रहे हैं तो हम और हमारा यह समाज किस तरह की व्यवस्थाओं के बीच जी रहा है। जब दो पक्षों में कोई विवाद होता है तो लोगों को हमने यह कहते सुना है कि आई विल सी यू इन कोर्ट। एक आम आदमी शासन प्रशासन या किसी वर्ग विशेष अथवा व्यक्ति द्वारा उत्पीड़ित किया जाता है तो वह यह सोचता है कि कम से कम अदालत से तो उसे इंसाफ मिल ही जाएगा जिस न्यायपालिका पर समाज के हितों तथा संविधान की सुरक्षा की जिम्मेदारी हो उस सुप्रीम कोर्ट को अगर देश का कोई नेता सुप्रीम कोठा बताने का दूस्साहस कर सकता है तथा एक अधिवक्ता चीफ जस्टिस पर जूता उछाल सकता है तब आप किसी देश की न्यायपालिका से कैसे न्याय की उम्मीद कर सकते हैं। निश्चित तौर पर यह गलत ही है। मुख्य न्यायाधीश ने अगर सुनवाई के दौरान अपनी टिप्पणी में कुछ आपत्तिजनक बात कहीं भी गई जिसके बारे में खुद चीफ जस्टिस द्वारा स्थिति को साफ करते हुए यह कहा गया कि सोशल मीडिया पर इसे गलत ढंग से पेश किया जा रहा है तो मामला वहीं समाप्त हो जाना चाहिए था। लेकिन इस इंटरनेट के युग में जब तक लोगों को यह समझ आता है कि सही क्या है और गलत क्या है तब तक तो ट्रोलर आर्मी आग लगा चुकी होती है। सनातन धर्म के बारे में कुछ कहने से पूर्व अगर हम सिर्फ एक बात को जान ले कि सत्य सनातन है तो सत्य का क्या कोई अपमान कर सकता है या सत्य से किसी की धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं? लेकिन वर्तमान दौर के समाज में धार्मिक कलुषिता का जहर इस कदर घोला जा चुका है कि यहां भावनाओं को आहत बार—बार होता देखा जा सकता है। अभी एक दलित युवक की पीट—पीट कर हत्या कर दी गई यह मामला रायबरेली का है। इस घटना का दिल दहलाने वाला वीडियो अभी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। जो इस समाज के उस विभत्स चेहरे को बेनकाब करता है जो शासन—प्रशासन के सबका साथ ,सबका विकास व सबका विश्वास का दावा करते हैं। कुछ लोग यह भी सवाल उठा रहे हैं कि अगर चीफ जस्टिस अपर कास्ट से होते तो क्या उनके साथ इस तरह का व्यवहार होता? आजादी के 75 साल बाद भी देश जाति धर्म के नाम पर विवादों की खाई में अगर इतना अधिक गहराया है तो यह अत्यंत ही चिंतनीयं है और निंदनीय भी। नफरत का ऐसा देश और समाज किसने बनाया है? यह बात सबसे अधिक चिंतनीय है।

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