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युवा शक्ति की बड़ी जीत

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वाह! धामी! वाह! सुधि पाठकों को शायद इस संपादकीय को पढ़कर यह आश्चर्य हो सकता है कि पेपर लीक मामले को लेकर सीएम धामी और उनकी सरकार की खिलाफत करने वाले आज सीएम धामी की वाह—वाही क्यों कर रहे हैं। तो हम आपको इसके जवाब में यह कहना चाहते हैं कि मुख्यमंत्री धामी का पेपर लीक मामले में कल युवा आंदोलनकारी बेरोजगारों के बीच जाकर सहृदयता और संपूर्ण संवेदनाओं के साथ उनसे संवाद करना और सीबीआई जांच की संस्तुति करना ठीक वैसा ही काम है जैसा किसी क्रिकेट मैच में अंतिम बॉल पर जीत के लिए पांच रनों की दरकार हो और क्रीज में खड़ा बैट्समैन उस पर लंबा छक्का मार कर अपनी टीम को विजय दिला दे, ऐसी स्थिति में टीम और दर्शकों की तालियों से स्टेडियम का गंूज जाना स्वाभाविक ही होता है। उनके इस फैसले से आंदोलित युवा बेरोजगार तो खुश है ही साथ ही वह आम लोग भी खुश हैं जो प्रदेश में पारदर्शी शासन प्रशासन चाहते हैं। भले ही देर से ही सही लेकिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी समय रहते अपने उन चाटुकारों के चंगुल से बाहर निकल सके जो उन्हें अब तक इसे पेपर लीक न मानने और आंदोलन कर रहे युवाओं को नकल जिहादी बताने और राष्ट्रीय विरोधी ताकतों के षड्यंत्र में फंसने तथा राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिशें बताने की सलाह देकर उन्हें मिस गाइड कर रहे थे। विपक्ष की तो बात ही छोड़ दीजिए उनकी पार्टी के अंदर बैठे कुछ लोग भी इस बात पर नजरें लगाए बैठे थे कि इस विरोध से कब वह इतने असहज हो और कोई गलत फैसला ले कि क्लीन बोल्ड हो जाए। लेकिन अंतिम क्षणों में ईश्वर ने न सिर्फ उन्हे ऐसी सद्बुद्धि दी कि उनके एक ही शॉर्ट से पुरी बाजी को ही पलट कर रख दिया। इसलिए मुख्यमंत्री धामी निश्चित ही बधाई के पात्र हैं। अच्छा हो कि इस प्रकरण से वह अपने आसपास जमा चाटूकारों की भीड़ में उन सभी चेहरों को भी चिन्हित कर सकते हैं जो उनका सारा खेल ही बिगाड़ने पर आमादा थे। इस मामले की सीबीआई जांच की संस्तुति किए जाने का काम भले ही मुख्यमंत्री ने खुद किया हो लेकिन इसका जश्न पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के आवास पर मनाया गया। उन्होंने पूर्व समय में सीएम धामी की राय से अलग हटकर सीबीआई जांच की मांग का समर्थन किया था। अब वह जश्न मनाकर इसका श्रेय लेने वालों में स्वयं को सबसे आगे रखने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भटृ जो इस मुद्दे को लेकर पेपर ही तो बाहर आया है अभी रिजल्ट तो अंदर है जैसे उटपटांग बयान देते रहे हैं। जहां तक सवाल इस बात का है कि सीएम धामी के इस फैसले का सबसे ज्यादा लाभ किसे मिलेगा उन युवा छात्र नेताओं को जो प्रदेश की राजनीति में प्रवेश के लिए संघर्षरत है। या फिर कांग्रेस को जो युवाओं के इस आंदोलन के दौरान लाठी से थन छूकर दूध निकालने की उम्मीद लगाए बैठी थी या फिर मुख्यमंत्री धामी और उनकी पार्टी बीजेपी को जिसने इसकी सीबीआई जांच की संस्तुति कर खूब तालियां बटोरी है। यह भले ही अभी भविष्य के गर्भ में छिपा हो लेकिन वास्तव में यह उन युवा बेरोजगार छात्र नेताओं की बड़ी जीत है जिन्होंने 8 दिनों तक पूरी सतर्कता व संघर्ष के साथ एक सयमित आंदोलन को न सिर्फ संचालित किया बल्कि एक ऐसी सरकार को जो किसी के सामने झुकने को कभी तैयार नहीं होती थी उसे अपनी मांगे मानने पर विवश कर दिया। सीएम धामी यह अच्छी तरह जान समझ चुके थे कि पूरे राज्य में जंगल की आग की तरह यह मामला फैल चुका है। यह युवाओं का आंदोलन उनके राजनीतिक सफर को कितना बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है। लेकिन अब वह इसके डैमेज कंट्रोल में काफी हद तक सफल हो चुके हैं। युवाओं के विश्वास को जीत कर ही आज के वर्तमान की राजनीति में बना रहा जा सकता है। यह सच सभी के लिए बड़ा सबक है।

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