यूकेएसएसएससी पेपर लीक मामले को लेकर प्रदेश के युवा आग बबूला हैं। वह किसी भी कीमत पर अपनी मांगों के माने जाने से पहले अपना आंदोलन समाप्त करने को तैयार नहीं है। युवाओं के भविष्य से जुड़े इस मुद्दे की अहमियत सिर्फ रोजगार की समस्या से नहीं जुड़ी है। यह एक अत्यंत ही प्रभावी राजनीतिक मुद्दा भी है। इस सत्य को वह युवा नेता जो इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं वह तो जानते हैं ही इसके साथ ही विपक्षी दल कांग्रेस और भाजपा के नेता भी इसे बखूबी जानते समझते हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जो अब यह समझा रहे हैं कि उन्हें इस मुद्दे की सीबीआई जांच से भी कोई गुरेज नहीं है अगर यही सच है तो फिर वह इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप क्यों नहीं देते हैं। वह पेपर लीक होने वाले दिन से यह क्यों कह रहे हैं कि यह पेपर लीक का मामला नहीं है। उन्हें या उनकी पार्टी से जुड़े नेताओं द्वारा आंदोलनकारी युवा बेरोजगारों के आंदोलन को निष्प्रभावी बनाने के क्यों प्रयास किया जा रहे हैं हरिद्वार से स्कूली छात्रों को बसों में भरकर दून लाने और एक समानांतर छद्म आंदोलन खड़ा करने की जरूर क्यों पड़ी थी। दरअसल उन्होंने अपने कार्य व्यवहार से खुद ही इस मामले में सरकार की भूमिका को संदेहास्पद बनाने का काम किया गया है। शुरुआत में ही अगर उन्होंने आंदोलित छात्रों की सुनी होती तो न बॉबी पवार और न मोहित डिमरी तथा त्रिभुवन चौहान को इस मुद्दे पर राजनीति करने का जैसा कि अब धामी कह रहे हैं, मौका मिलता ही नहीं। उस कांग्रेस को जिसके नेता अब आंदोलित छात्रों के समर्थन में खुद भी धरने प्रदर्शन कर रहे हैं और न भाजपा के उन नेताओं को कुछ कहने का अवसर मिलता जो उन्हें आंदोलनकारी बालकों की बात सुनने और सीबीआई जांच की मांग को मानने की नसीहतें दे रहे हैं। पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ऐसे अकेले नेता नहीं है। जो छात्रों की सीबीआई जांच की मांग का समर्थन कर रहे हैं अन्य और भी तमाम नेता है। भाजपा के नेता खुद इस मुद्दे पर दो हिस्सों में बंटे हुए हैं। कुछ मंत्री और विधायक पत्रकार वार्ता कर वही राग अलाप रहे हैं जो मुख्यमंत्री धामी कहते आ रहे हैं और वह भी इसे पेपर लीक की घटना नहीं मान रहे हैं। कुल मिलाकर मुख्यमंत्री धामी भी इस चौतरफा बढ़ते दबाव के कारण असहज हो गए हैं और उनकी खुद की समझ में भी नहीं आ रहा है कि इसका वह पटाक्षेप कैसे करा सकते हैं? समय जैसे—जैसे बीत रहा है स्थितियां और अधिक गंभीर होती जा रही है तथा राजनीतिक माहौल भी गरमाता जा रहा है। मुख्यमंत्री धामी के सामने अपने शासनकाल में पहली बार इस तरह की गंभीर चुनौती पेश आई है वह यह भी जानते हैं कि अगर युवा जिन्हें वर्तमान दौर में जेन—जी कहा जा रहा है हाथ से निकल गए अथवा नाराज हो गए तो इसकी फिर भरपाई करना मुख्यमंत्री तो क्या उनकी पार्टी का कोई भी नेता नहीं कर सकेगा।




