देश के तमाम हिस्सों से जो उग्र आंदोलनों तथा धरने प्रदर्शनाें की जो खबरें आ रही है उन्होंने सत्तासीन नेताओं की बेचैनी बढ़ा दी है। खास बात यह है कि इन नेताओं द्वारा इन प्रदर्शनों को विपक्षी नेताओं द्वारा सत्ता के खिलाफ उकसाने की कार्यवाही बताकर देश में अराजकता फैलाने और मोदी की सत्ता पलटने की कोशिश के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। सत्ता पक्ष के नेताओं का यह कहना है कि राष्ट्र विरोधी ताकते भारत को नेपाल बनाना चाहती है। अथवा इसके पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है। यह सभी बातें यह बता रही हैं कि सत्ता में बैठे नेता इस कदर बेचैन है कि उन्हें यह भी समझ नहीं आ रहा है कि भारत भला नेपाल या बांग्लादेश कैसे बन सकता है। यह धरना भाजपा के नेताओं की कपोल कल्पित सोच है जिसका प्रचार करके वह सिर्फ विपक्ष को कमजोर करना चाहते हैं। उन्हें इस बात का डर है कि 10 साल की एंटी इनकैम्पसी कहीं उन्हें सत्ता से बाहर न कर दे। इस मिथ्या प्रचार के सहारे वह जेंन—जे को मुद्दे के तौर पर पेश किया जा रहा है। सच यह है कि भाजपा के नेताओं द्वारा 2014 में सत्ता में आने के बाद जनता की किसी भी आवाज को सुनना तो दूर उसे बेशर्मी से दबाने का जो काम किया गया है वर्तमान में यह उसी की परिणिति है। इस विरोध प्रदर्शन में जेन—जी की सोच और ताकत नहीं है। हर क्षेत्र के अलग—अलग मुद्दे हैं। पहली बात अगर उन युवा बेरोजगारों की करें तो यह आसानी से समझा जा सकता है कि 2 करोड़ नौकरियां हर साल देने का वायदा करने वाली सरकार ने 10 साल में भी 2 करोड़ नौकरी नहीं दी। पेपर लीक और परीक्षाओं के विलंबन ने करोड़ो युवाओं को नौकरी की उम्र सीमा से बाहर भेज दिया अपनी समस्याओं को लेकर वह सड़कों पर उतरे तो उन्हें पुलिस और पीएसी की लाठियां खानी पड़ी बात अगर किसानों से किए गए एमएसपी कानून की करें तो डेढ़ साल तक सड़कों पर पड़े रहने और 700 किसानो की मौत के बाद भी सरकार ने उनकी बात सुनने की बजाय सड़कों पर कीले ठोक कर और हवा मेे आंसू गैस के गोले दाग कर उन्हें दिल्ली आने से रोक दिया गया। उल्टा तीन किसान विरोधी कानून थोपने की कोशिश की गई जो विरोध के कारण वापस लेने पड़े। हमने जंतर मंतर पर महिला पहलवानों को उनकी बात सुनने की बजाय सड़कों पर उन्हें घसीटते देखा। लद्दाख के लोग सरकार से अगर पूर्ण राज्य का दर्जा मांग रहे थे तो यह वायदा किया किसने था सोन भगाचुक जिनके नेतृत्व में यह आंदोलन इतने समय से शांतिपूर्ण चल रहा था अगर उनकी बात सुनी गयी होती तो क्या यह हिंसक हालात पैदा हुए होते। शायद नहीं सच यही है कि सत्ता ने 10—11 सालों में अपने मन की बात कही अपने फैसले जनता पर थोप और विरोध करने वालों को बलपूर्वक दबाया या फिर जेल में घुसाने का काम किया। लेकिन अब देश की जनता इससे ऊब चुकी है और वह कुछ भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं। देश के लोग देश के खिलाफ नहीं सत्ता के खिलाफ आज सड़कों पर उतर रहे हैं तो यह सिर्फ जेन—जी का मामला नहीं है सभी वर्ग के लोगों से इसके लिए कोई और नहीं सरकार खुद जिम्मेदार है।




