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बचत उत्सव या बर्बादी का जश्न

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आपदा को भी अवसर बना देने का हुनर रखने वाले भाजपा के नेता और सरकार के फैसलों पर अब देश की जनता ने हंसना शुरू कर दिया है। देश की जनता की जेब जब खाली हो गई तब जाकर सरकार में बैठे नेताओं को यह पता चला कि अगर तुरंत ही कुछ राहत न दी गई तो असंतोष सड़कों तक आ जाएगा इसलिए सरकार ने जीएसटी दरों में सुधार करने का फैसला लिया। 8 साल पहले जब जीएसटी लागू किया गया था तो इसे देश और समाज की आर्थिक दशा को सुधारने वाला अमोघ अस्त्र बताकर सत्ता में बैठे लोगों ने जश्न मनाया था अब जब इसके दुष्परिणाम सामने आते दिखने लगे तो जीएसटी स्लैब में बदलाव कटौती को सरकार ने अपनी जनहितकारी नीति बताने का प्रचार करना शुरू कर दिया। पीएम राष्ट्र को संबोधित करने के लिए टीवी पर आए और सरकार के फैसले को जनहित कारी बताते हुए 20 मिनट तक लोगों को यह समझाते रहे कि इस कर कटौती से लोगों को कितना फायदा होने वाले हैं किस—किस वस्तुओं की कीमतों पर कर कम होने से उनकी कितनी बचत होगी और उनकी जेब में कितना पैसा आएगा। उनका दशहरा और दिवाली किस कदर खुशियों भरी होने वाली है। वह सब कुछ खरीद सकेंगे जो भी वह चाहते हैं। इंतहा तो यह देखिए कि भाजपा के नेता दुकान दुकान जाकर और बाजार—बाजार जाकर व्यापारियों की दुकानों पर बचत उत्सव के स्टीकर लगा रहे हैं और सरकार के फैसले पर जश्न मना रहे हैं। जनता को यह बता रहे हैं कि देखा आपने मोदी की सरकार उनका कैसे और कितना ख्याल रखती है। इन नेताओं से यह कोई भी पूछने वाला नहीं है कि 8 साल में इस जीएसटी ने जनता से कितना लूटा है न कोई यह पूछने वाला है कि अगर इसी फैसले से जनता का भला होना था तो 8 साल पहले वह फैसला क्यों किया गया जिसने जनता से सब कुछ लूट लिया। यह बचत उत्सव क्या जनता के जख्मों पर नमक छिड़कना नहीं है। लेकिन भाजपा के उन नेताओं जिन्हें सिर्फ इवेंट मैनेजमेंट की राजनीति आती है यह कौन बताएं कि उनका यह बचत उत्सव भी ऑपरेशन सिंदूर के जैसा ही है जब पाक पर हमले के बाद घर—घर जाकर महिलाओं को सिंदूर भेंट करने का फैसला लिया गया, जिसे भारी विरोध के चलते दबे पांव वापस भी ले लिया गया था। 8 सालों में सरकार ने जनता की जब से 255 लाख करोड़ निकाल लिया गया और अब 255 लाख करोड़ की कटौती कर अपनी पीठ खुद ही थपथपाई जा रही है। 22 तारीख से भले ही जीएसटी के स्लैब बदल गए हो लेकिन आप कहीं भी किसी भी शहर में बाजार जाकर देख सकते हैं कि आम उपभोग की वस्तुओं के दामों में एक आने भी कम नहीं किया गया है दुकानदारों का साफ कहना है कि जिस समान पर उन्होंने जीएसटी दिया है उसे तो पुराने रेट पर ही बेचेंगे। इन घटी हुई कीमतों का लाभ जनता तक कब पहुंचेगा कुछ पता नहीं है लेकिन इस दिवाली तक तो कुछ नहीं होगा। इसलिए जनता भी इन बीजेपी नेताओं को बचत उत्सव पर पानी पी—पीकर कोस रही है। जनता पूछ रही है कब तक हमारा मूर्ख बनाओगे और कब तक हमारी बर्बादी का जश्न मनाओगे।

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