क्या राजनीति के मायने अब सिर्फ इवेंट मैनेजमेंट तक ही सीमित होकर रह गए हैं। क्या देश के नेताओं ने राजनीति का भी ऐसा बाजारीकरण कर दिया गया है की स्पर्धा में टिके रहने के लिए झूठे घोषणा पत्रों के वायदे और अखबारों में छपने वाले विज्ञापनों से भी नेताओं का कुछ भला नहीं हो पा रहा है और आयोजनों की दुकान इस सोच के साथ सजाने पर मजबूर हो रहे हैं कि जो दिखता है वही बिकता भी है। बीते एक दशक में देश की राजनीति का पूरा चेहरा मोहरा जिस तेजी से बदला है उसे समझ पाना आम आदमी तो क्या राजनीति के पंडितों के लिए भी बहुत मुश्किल हो गया है। इस डिजिटल राजनीति के दौर में टीवी चैनलों से लेकर अखबारों तक में जिस तरह की खबरें आम आदमी तक पहुंच रही हैं अब उनकी विश्वसनीयता लगभग समाप्त हो चुकी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर खबरें कम और अफवाहें ज्यादा होती हैं। खबरों के इस शोर का राजनीति और नेताओं को भरपूर फायदा मिल रहा है क्योंकि सच्चाई तो आम आदमी तक पहुंच ही नहीं पा रही है। अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उत्तराखंड आना था। उनके उत्तराखंड आने का मकसद था राज्य के आपदा प्रभावितों का हाल—चाल जानना और उनकी क्या मदद केंद्र सरकार करने वाली है इसकी घोषणा करना। दौरे से 2 दिन पूर्व तक भी मीडिया को बस यह जानकारी थी कि पीएम वाराणसी से सीधे उत्तराखंड आएंगे और इस दिन नहीं आ सके तो अगले दिन आएंगे। साथ ही जब उनके आने का कार्यक्रम तय हो गया तो बताया गया कि पीएम प्रभावितों का हवाई सर्वे भी करेंगे। लेकिन खराब मौसम के कारण हवाई सर्वे का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया। सूबे की सरकार द्वारा आपदा प्रभावित क्षेत्रों से कुछ चुनिंदा लोगों को जौली ग्रांट एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री से मिलवाया गया। कार्यक्रम प्रायोजित था तो उन सभी प्रभावितों को पहले यह भी पढ़ाया गया था कि उन्हें क्या बोलना है और क्या नहीं बोलना है। सभी ने प्रधानमंत्री को यही बताया कि राज्य सरकार से उन्हें हर तरह की सहायता मिल रही है। आपदा प्रभावितो की आपबीती सुनकर पीएम की आंखों से भी आंसू छलक पड़े। लेकिन इसके अगले ही दिन चमोली के एक आपदा प्रभावित का ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। जिसमें नरेंद्र बिष्ट जो इस आपदा में अपनी बेटी कविता (21) को खो चुके हैं सामने आ गया। जिसमें उन्होंने इस रहस्य का उद्घाटन किया कि प्रशासन ने पहले उन्हें भी पीएम से मिलने वालों की सूची में शामिल किया गया था लेकिन कांग्रेस कार्यकर्ता होने के कारण ऐन मौके पर उनका नाम सूची से हटा दिया गया। इससे पूर्व राज्य के कुछ जाने—माने इफ्ंयूएऐसर्स के वीडियो वायरल हुए थे जो सीएम धामी की आपदा राहत कार्यों के लिए तारीफ कर रहे थे तथा हिमाचल के सीएम सुख्खू पर निशाना साध रहे थे। इन सभी की स्क्रिप्ट एक ही है तथा विजुअल भी समान थे। इसके बारे में खुद उन्होंने ही खुलासा किया गया कि एक प्रायोजित आयोजन था। आपने मन की बात कार्यक्रम में केंद्रीय योजनाओं के अनेक लाभार्थियों को भी सुना होगा, खैर यह इवेंट मैनेजमेंट का फार्मूला अब इतना आम हो चुका है कि इसके बारे में सभी जान चुके हैं। नितिन गडकरी तो यहां तक कहते हैं कि जो जितना बड़ा झूठ बोल सकता है वह उतना ही बड़ा नेता बन सकता है तो फिर इस राजनीति के बारे में कहा भी क्या जाए।




