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बड़ा बदलाव, समय की जरूरत

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`सिंहासन खाली करो जनता आती है, चाहे कोई राजा हो या फिर महाराजा अथवा किसी भी देश का प्रधानमंत्री हो या फिर राष्ट्रपति उसका ओहदा और अस्तित्व सिर्फ तभी तक होता है जब तक जनता उसे अस्तित्व में बनाए रखना चाहती है। जब जन विश्वास की यह दीवार ढह जाती है तब किसी की भी सल्तनत चंद मिनटो में ही कैसे भरभरा कर खंड—खंड हो जाती है नेपाल इसकी सबसे ताजा मिसाल है। इससे पूर्व हालांकि हम कुछ इसी तरह के हालात अपने पड़ोसी मुल्क श्रीलंका और बांग्लादेश में भी देख चुके हैं। नेपाल का जिक्र यहां इसलिए करना ज्यादा जरूरी हो गया है क्योंकि देश की सर्वाेच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस वी आर गवई ने आज राज्यपालों और राष्ट्रपतियों द्वारा राज्य सरकारों के विधेयकों को रोके जाने के मामले की सुनवाई के दौरान एक ऐसी टिप्पणी की जिसमें नेपाल के वर्तमान हालात का भी जिक्र किया गया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा कर्नाटक सरकार की अपील पर हालांकि पहले ही राज्यपालों व राष्ट्रपति के लिए किसी भी सरकार द्वारा पास किए गए विधेयको पर फैसला लेने के लिए समय सीमा तय कर दी गई है लेकिन राष्ट्रपति द्वारा चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट को एक खत लिखकर उनके अधिकारों पर जानकारी मांगे जाने का यह मुद्दा अभी भी न्यायालय में विचाराधीन है। चीफ जस्टिस वी आर गवई ने इस पर आज जो कुछ कहा है वह अत्यंत ही गंभीर और विचारणीय मुद्दा है। उन्होंने कहा है कि हमें अपने संविधान पर गर्व है जरा नेपाल के हालात की ओर देखिए? चीफ जस्टिस गवई ने जो कुछ कहा है वह उन तमाम नेताओं जो संविधान बदलने की सोच के साथ सत्ता में बने रहना चाहते हैं, उनके लिए एक गंभीर सवाल है? बीते लोकसभा चुनाव से संविधान बदलने का मुद्दा तो चर्चाओं के केंद्र में बना ही हुआ है इसके साथ ही देश की संवैधानिक स्वायत्तता धारी संस्थाओं को भी अपने अनुकूल काम करने या मातहत बनाने की जो कोशिशे की जा रही है वह किसी से भी छिपी नहीं है। कुछ बातें कही जाती हैं और कुछ बातें समझी जाती हैं चीफ जस्टिस ने जो कहा है उसका सीधा आशय यह है कि अगर सत्ता का आचरण संविधान संम्वत नहीं होता है तो फिर उसका हश्र नेपाल जैसा होता है। इसलिए हमें अपने संविधान पर गर्व होना चाहिए तथा संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखा जाना चाहिए। नेपाल की जनता का आक्रोश कोई बेवजह नहीं है। यदि कुछ गिने चुने लोग सत्ता को अपनी बपौती मानकर उस पर कुंडली मार कर बैठ जाए और सत्ता में बने रहने के लिए अपने विधान को बदलने लगे जैसा कि नेपाल के वयोवृद्ध प्रधानमंत्री द्वारा किया जा रहा था तो इसके नतीजे में वह सब कुछ होना ही था जो हम देख रहे हैं। जनता सड़कों पर उतरी नहीं बल्कि उसने पीएम के घर और संसद भवन से लेकर सुप्रीम कोर्ट परिसर तक पूंQक डाला गया। लोकतंत्र में सरकारों के पास जो ताकत व शक्ति होती है वह संविधान और जनता के द्वारा दी गई होती है और जनता जब सत्ता की मनमानी से ऊब जाती है तब नेपाल जैसे हालात ही होते हैं। जिनकी ओर इशारा आज चीफ जस्टिस गवई द्वारा किया गया है। उधर आज संघ प्रमुख का एक ऐसा बयान फिर आया है जिसमें उन्होंने सत्ता का दुरुपयोग अपने निजी हितों के लिए न करने और 75 साल की उम्र पर युवाओं के लिए कुर्सी छोड़ने की नसीहत दी है। यह बयान उपराष्ट्रपति चुनाव के बाद आया है। इसके बाद पीएम मोदी के जल्द इस्तीफे की खबरें दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में तेज हो गई है। वह इस्तीफा देते हैं तब भी और नहीं देते हैं तब भी यह देश की राजनीति में बड़े बदलाव का ही संकेत है।

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