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कुछ तो बड़ा होने वाला है?

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इन दिनों देश के राजनीतिक हालात जिस तेजी से बदलते दिख रहे हैं वह इस बात का साफ संकेत है कि कुछ न कुछ बड़ा घटित होने वाला है और वह कभी भी हो सकता है। कल उपराष्ट्रपति पद के लिए उपचुनाव होने वाला है। सत्ता रूढ़ दल भाजपा के उन नेताओं ने उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का जिस तरह अचानक इस्तीफा कराया गया उस समय शायद उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनका यह फैसला उनके लिए इस कदर चुनौती पूर्ण साबित हो जाएगा कि सत्ता का भविष्य ही दांव पर लग जाएगा। भले ही अंकों का गणित सत्ता पक्ष की ओर सही लेकिन धरातल की हकीकत यह है कि अपनी जीत को लेकर खुद भाजपा के नेता भी आशंकित है जहां उन्हें अब अपने सहयोगी दलों पर तो भरोसा है ही नही, भाजपा के सांसदों को भी एकजुट रखने की चुनौती से दो—चार होना पड़ रहा है। उपराष्ट्रपति के चुनाव और फिर बिहार विधानसभा के चुनाव जो नवंबर में होने हैं अगर किसी एक भी चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ता है तो यह वर्तमान सरकार को एक ऐसे संकट में लाकर खड़ा कर देगा, जब उसका केंद्रीय सत्ता में पूरे कार्यकाल 2029 तक टिके रहना संभव नहीं होगा। नेता विपक्ष राहुल गांधी जो कर्नाटक की महादेवपुरा सीट पर फर्जी वोटरों का कच्चा चिट्ठा जनता के सामने रखकर सरकार और चुनाव आयोग को ऐसे सवालों के कटघरे में लाकर खड़ा कर चुके हैं कि उनका कोई जवाब किसी को भी देते नहीं बन रहा है। वहीं विपक्ष इस वोट चोरी के मुद्दे को इस कदर मजबूती दे चुका है कि संसद से लेकर बिहार की सड़कों तक वोट चोर गद्दी छोड़ का नारा देश के कोने—कोने तक अब लोगों की जुबान पर चिपक चुका है। खास बात यह है कि विपक्ष का यह अभियान अब रुकने की बजाय और भी अधिक तूल पकड़ता दिख रहा है। क्योंकि राहुल गांधी इस लेकर सार्वजनिक मंचों से इस बात का ऐलान कर रहे हैं कि वह एटम बम के बाद हाइड्रोजन बम को फोड़ने वाले हैं। उनका यह ऐलान हवा हवाई नहीं कहा जा सकता है वह अवश्य ही कोई बड़ा धमाका करेंगे। भाजपा ने अपने शासन काल के 10—11 सालों में तमाम विपक्षी राजनीतिक दलों को अस्तित्वहीन बनाने के लिए भले ही कुछ भी हथकंडे अपनाए हो लेकिन अब इन तमाम दलों को यह समझ आ चुका है कि भाजपा के इस खेल का मुकाबला उन्हें कैसे करना है। इन तमाम दलों का इंडिया के मंच पर राहुल के नेतृत्व में आना और जो नहीं भी आ रहे हैं उनका अपने राजनीतिक धरातल वैचारिक सोच वाले दलों के साथ खड़े होना भी भाजपा के लिए बड़ी भविष्य की चुनौती है। चर्चा है कि चंद्रशेखर रावण की पार्टी और मायावती आगामी 9 सितंबर को एक ही मंच पर नजर आने वाली है। उनकी एकता का मतलब दलित व पिछड़ों को फिर से एक मंच मिलना ही होगा। इससे सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा और सपा को ही होता दिख रहा है वहीं दूसरी ओर धनखड़ के साथ घटे घटनाक्रम को लेकर चौधरी अजीत सिंह के बेटे जयंत और जाट समाज, जो भाजपा से नाराज है वही रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान जो भाजपा की नीतियों से नाराज हैं अब एनडीए से ऊब चुके हैं। सहयोगी दलों की नाराजगी अब केंद्रीय सत्ता पर भारी पड़ती दिख रही है। इन जटिल से दिखने वाले हालात में भाजपा के शीर्ष नेताओं को भारी बेचैनी तो है ही क्योंकि उन्हें समस्याओं का उचित समाधान नहीं मिल पा रहा है। उधर 75 साल पूरे होने पर पीएम मोदी का राजनीतिक से अलग होने का सवाल भी चर्चाओं में है। हालात कुल मिलाकर यही संकेत दे रहे हैं कि देश की राजनीति में किसी भी समय कुछ भी हो सकता है यह अलग बात है कि यह कब होगा।

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