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नूर—ए—चश्म—प्रीतम

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सियासत भी क्या चीज है दोस्तों! कौन कब किसका दोस्त बन जाएगा और कब कौन किसका दुश्मन इसको समझना किसी के लिए भी आसान नहीं होता है। खास बात यह है कि राजनीति में कभी कोई किसी का स्थाई दोस्त और दुश्मन नहीं होता। समय के साथ सियासी रिश्ते भी पल भर में बदल जाते हैं। चकराता विधायक प्रीतम सिंह जिनसे कांग्रेस के प्रभावी नेताओं ने बीते समय में प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी छीन ली थी और उन्हें नेता विपक्ष के पद से भी बेदखल कर दिया था आज वही विधायक प्रीतम सिंह कांग्रेसियों के लिए कांग्रेस के सबसे बड़े नेता हो गए हैं। अगर किसी को इस बात पर यकीन नहीं हो रहा है तो उन्हें कल पंचायत अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के उस शपथ ग्रहण में पूर्व सीएम हरीश रावत के उसे संबोधन को जरूर सुनना चाहिए जिसमें वह प्रीतम सिंह की तारीफ एक अलग ही अंदाज में करते दिख रहे हैं। हरीश रावत कहते हैं कि प्रीतम ही अब कांग्रेस के वीवीवीआईपी है। नूर भी वही है और कांग्रेस के नूर—ए—चश्म भी वही हैं। वह अब हमारे दिलबर भी हैं और दिल जानी भी वही है। हरीश रावत कहते हैं कि अगर आप सभी की इजाजत हो तो ऐसे प्रीतम सिंह को मैं एक फूलों का गुलदस्ता पूरी कांग्रेस की ओर से भेंट कर उनका सम्मान करूं। बेहद ही अतीचारी हुए राजनीति के और कांग्रेस के गुरुतर माने जाने वाले हरीश रावत की इस प्रशंसा के अब कांग्रेसियों द्वारा कई मायने निकाले जा रहे हैं। इसका सबसे पहला कारण है उगते सूरज को सभी का सलाम करना। लेकिन राजनीति में नेता किसी की सफलता से खुश हो यह दस्तूर होता ही नहीं है वहां तो इसके उलट काम होता है। लेकिन पंचायत चुनाव में प्रीतम सिंह ने अपने जिस राजनीतिक कौशल का प्रमाण दिया है वह वाकई लाजवाब तो है ही। 12 में से 11 जिला पंचायतों में हार के बावजूद अकेले दून में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष जैसे दोनों पदों पर कब्जा करना वह भी भाजपा के वर्चस्व को चुनौती के चक्रव्यूह को तोड़कर, इसलिए यह उनकी उपलब्धि कम बड़ी नहीं है। उनका बेटा अभिषेक सिंह को भले ही भाजपा की आरक्षण नीति कुचक्र के कारण अध्यक्ष बनने से रोक पाई हो लेकिन न तो वह कांग्रेस को अध्यक्ष पद पर कब्जा करने और अभिषेक को उपाध्यक्ष बनने से रोकने में सफल नहीं हो सके है। कांग्रेस में इन दिनों 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर ही सारी राजनीतिक बिसात बिछाई जा रही है। पूर्व सीएम हरीश रावत जो अब खुद ही स्वयं के बूढ़ा हो जाने का प्रचार कर रहे हैं, उन्होंने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर विजय पा ली हो, ऐसा भी नहीं है। भले ही अब वह सूबे के मुख्यमंत्री बन पाए न बन पाए, लेकिन सूबे की राजनीति पर अपनी मजबूत पकड़ जरूर बनाएं रखना चाहते हैं। एक तरफ कांग्रेस में दोबारा आने वाले डा. हरक सिंह इन दिनों अत्यंत ही आक्रमक तेवर वाली राजनीति कर रहे हैं। अब तक उनकी वापसी के विरोध की कमान संभालते रहे हरीश रावत अब उनकी भी तारीफ करने लगे हैं। भले ही प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा और पूर्व अध्यक्ष गणेश गोदियाल अपने पूरे दमखम के साथ कांग्रेस को मजबूती देने के काम में जुटे हो, लेकिन हरीश रावत जैसे पुराने नेता युवा पीढ़ी को स्वच्छ रूप से आगे बढ़ाने में विश्वास नहीं रखते हैं। कांग्रेस पिछले चुनावों में जिस तरह नीचे और नीचे जाती रही है, अब राहुल गांधी के नेतृत्व में उसके फिर आगे बढ़ने की संभावनाएं बन रही है। ऐसे में राज्य के नेता भी अपने—अपने लिए भविष्य सुनिश्चित करने में जुटे हैं। जबकि इसका लक्ष्य पार्टी का भविष्य सुनिश्चित करना होना चाहिए था। कांग्रेस के अंदर अगर किसी भी तरह की आंतरिक गुटबाजी हावी हुई तो वह कांग्रेस के लिए अच्छी नहीं हो सकती है।

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