Home उत्तराखंड देहरादून चिड़िया चुग गई खेत?

चिड़िया चुग गई खेत?

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‘सब कुछ लुटा कर होश में आए तो क्या हुआ’ जी हां। यह कहावत जीएसटी दरों में सुधार को लेकर विकास के लिए बूस्टर डोज और आम जनता के लिए इसे दिवाली और छठ पूजा का तोहफा बताने वाली केंद्र की मोदी सरकार पर 100 फीसदी सटीक साबित हो रही है। 8 साल पहले देश पर जीएसटी का डंडा चलाने वाली सरकार के फैसले ने जहां देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ कर रख दी और आम आदमी को इस कदर कंगाल बना दिया है कि उसके लिए 2 जून की रोटी का जुगाड़ करना भी दुश्वार हो गया तब कहीं जाकर सत्ता में बैठे लोगों को इस बात का एहसास हुआ है कि उनका यह फैसला कितना गलत था। अब जब जनता की जेब खाली हो चुकी है और वह अपनी बचत को भी खत्म कर चुकी है उसकी हालत ठीक वैसी ही है जैसे एक टके का ऊंट बिक रहा है हो लेकिन ऊंट खरीदने के लिए जेब में एक टका भी नहीं बचा है। एक समय रुपए की गिरती कीमत पर छाती पीटने वाली भाजपा और उसके नेताओं को अब डॉलर के मुकाबले गिरती कीमत की बात तक नहीं की जाती है। देश की जो जीडीपी दर 9 अंकों तक पहुंच चुकी वह अब 6 अंक पर बताई जा रही है वह भी सरकार की नई गणना नीति के अनुसार, अगर पुरानी गणना पद्धति से आकलन किया जाए तो वह 3.5 अंक पर है। एक देश, एक पहचान और एक विधान की बात करने वाली मोदी सरकार ने जब जीएसटी लागू किया था तो क्यों नहीं सोचा गया कि एक देश एक टैक्स की व्यवस्था देश में लागू की जाए हर साल लाखों करोड़ों का टैक्स वसूलने वाली यह सरकार इस बात पर अपनी पीठ थपथपाती रही कि इस बार जीएसटी के संकलन में इतना ज्यादा बढ़ोतरी हुई लघु और मंझले वर्ग के व्यापारियों का धंधा चौपट हो गया और आम आदमी की क्रय क्षमता जब समाप्त हो गई तब जाकर सरकार को इस बात का होश आया है कि अर्थव्यवस्था का तो कचूमर निकल ही गया, देश का आम आदमी भी सरकार की नीतियों से बर्बाद हो चुका है पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ही नहीं राहुल गांधी शुरू से ही सरकार के फैसले को न सिर्फ गलत बता रहे थे बल्कि इसे गब्बर सिंह टैक्स कह रहे थे लेकिन सरकार ने किसी की भी नहीं सुनी। खास बात यह है कि अपनी इतनी बड़ी नाकामी पर पर्दा डालने के लिए अभी इसे दिवाली व छठ का तोहफा करार दिया जा रहा है। विपक्ष की बात को कभी तब्जोह न देने वाली मोदी सरकार ने इस मामले में अपने नेताओं की बात को भी अनसुना कर दिया गया नितिन गडकरी ने बीते बजट के समय सदन में खड़े होकर कहा था कि सरकार को कम से कम शवों के संस्कार पर तो टैक्स नहीं लगना चाहिए था। यह कोई कम बड़ी बात नहीं थी शव दहन की लकड़ियों पर भारी टैक्स वसूली करने वाली सरकार अभी अपनी इस नाकामी पर पर्दा डालने के लिए कांग्रेस द्वारा बच्चों की टॉफी पर टैक्स वसूल करने की बात कह रही है सच यह है कि वह चाहे नोटबंदी का फैसला हो जिसका अचानक ऐलान कर पीएम ने देश को चौंका दिया था या फिर जीएसटी का फैसला। इन दोनों ही फैसलों ने देश की अर्थव्यवस्था को जितना नुकसान पहुचाया गया है उसकी भरपाई आने वाले कई दशक में भी संभव नहीं है इन फैसलों से देश के छोटे व मंझले उघम चौपट हो गए। रोजगार के अवसर समाप्त हो गए छोटे व्यापारियों की कमर टूट गई और आम आदमी का तो दीवाला ही निकल गया। रोजमर्रा की जरूरत का सामान अब वह पुड़ियाओं में खरीद पा रहा है। बाजार में बड़ी पैकिंग की मांग ही खत्म हो चुकी है। अब चाहे जीएसटी काउंसिल कुछ भी फैसला करें या फिर प्रधानमंत्री किसी से भी जनता को राहत मिल पाना मुश्किल है। सत्ता मिल जाना और सत्ता को सुचारू ढंग से चला पाना दोनों ही अलग—अलग बात है। मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री जो इस देश की अर्थव्यवस्था को गंभीर संकट से बाहर लाने के लिए जाने जाते हैं अब सीतारमण और प्रधानमंत्री मोदी का नाम देश के इतिहास में क्या कुछ करने के लिए जाना जाएगा यह मोदी मीडिया तय नहीं करेगा देश के अर्थशास्त्री व समाजशास्त्री तय करेंगे। लेकिन यह सरकार की अनुभवहीनता और दम्भ की प्रकाष्ठा का एक बेमिसाल नमूना है

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