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राजनीतिक उथल—पुथल

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अगर तुम हमें छेड़ोगे तो मैं तुम्हें भी छोड़ूंगा नहीं, तुम गोली मारोगे तो मैं तुम पर गोले दागुंगा। तुम मुझे पत्थर मारोगे मैं तुम पर फूल नहीं बरसाऊंगा। डॉ हरक सिंह इन दोनों सनसनी का पर्याय बन चुके हैं। 30 करोड़ का चंदा और खनन माफियाओं से उगाही के आरोप लगाने वाले हरक इन दिनों भाजपा के नेताओं और सरकार के खिलाफ ऐसी आग उगल रहे हैं कि हर कोई हैरान है। हर रोज उनके द्वारा एक नई बात की जा रही है तथा कहा जा रहा है कि अगर वह अपनी पर आ गए तो भाजपा के तमाम नेता जेल की सलाखों के पीछे पहुंच जाएंगे। हरक सिंह की बातों से भाजपा नेताओं के अंदर भी खलबली तो मची हुई है। वह डा. हरक सिंह का विरोध तो कर रहे हैं लेकिन दबी जुबान से ही कर पा रहे हैं। इसके अन्य कई कारण भी है भाजपा में भले ही ऊपर से यह दिख रहा हो कि सब कुछ सामान्य रूप से चल रहा है लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं। भाजपा में भी अंदर ही अंदर बहुत सारी बातें चल रही हैं। राज्य की कानून व्यवस्था और आपदा प्रबंधन को लेकर उठ रहे सवाल भी सरकार को परेशान करने वाले हैं। मुख्यमंत्री भले ही आपदा प्रभावितों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को सुन रहे हैं लेकिन आपदा पीड़ितों का दर्द इतना ज्यादा है कि उनके लिए भी ढांढस बंधाने से ज्यादा जरूरी उन लोगों की जान माल की सुरक्षा का मुद्दा ज्यादा अहम हो गया है जो कुछ सरकार कर रही है वह अत्यंत ही नकाफी है। जिसे लेकर राज्य के लोगों में भारी नाराजगी है। इस नाराजगी को लेकर दिल्ली दरबार के लोग भी नाखुश है डा. हरक सिंह ने खनन माफियाओं से चंदा वसूली का जो राज खोला गया है उनकी पुष्टि खुद भाजपा के नेताओं द्वारा किया जाना भी उन्हें परेशान कर रहा है। राजनीतिक हलको में इन दिनों सरकार और संगठन में बड़े बदलाव की खबरें अगर आ रही है तो यह खबरें कहीं और से नहीं आ रही बल्कि भाजपा के अंदर से ही आ रही हैं। मंत्रिमंडल में खाली पड़े पदों का सालों तक न भरा जाना और अब जब इन पदों को भरे जाने की चर्चाएं भी हो रही है तो पार्टी के शीर्ष नेताओं का दिल्ली दौड़ भी स्वाभाविक है। गदरपुर से भाजपा के विधायक और पूर्व शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे जब लौटकर वापस आए तो बहुत अधिक संयम बरतने के बावजूद अपने ही पार्टी के नेताओं व सत्ता में बैठे लोगों को ऐसी खरी खोटी सुनाने से भी नहीं चुके कि यहां तक कह गए कि अभी वह चुप है अगर कुछ कहने पर आ गए तो अच्छे अच्छों की कुर्सी हिल जाएगी। खनन के मुद्दे पर वह यह भी कहने से नहीं चुके कि क्षेत्र में 60 फीट तक जमीन को खोद कर रख दिया गया है जिसके वह सबूत भी दे सकते हैं और वह सबूत नहीं दे सके तो राजनीति से संन्यास ले लेंगे। वह इस बात पर भी सख्त नाराज दिखे कि पार्टी के असल कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की जा रही है जो पार्टी के लिए भारी नुकसान देह है। कुल मिलाकर अब अपनों के द्वारा ही सरकार तथा प्रशासन पर कई सवाल खड़े किये जा रहे हैं यह सब मंत्रिमंडल में जगह पाने के लिए किया जा रहा है या इसके पीछे कोई और अन्य वजह है इस विषय में कुछ भी कहा जाना संभव नहीं है। लेकिन राज्य की राजनीति में इस दौर में जिस तरह की चुनौतियां भाजपा और धामी सरकार को मिल रही है वह मुख्यमंत्री और भाजपा संगठन के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है। क्या यह सब राज्य की राजनीति में बड़े परिवर्तन का संकेत है इसका पता आने वाले समय में ही मिल सकेगा?

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