Home News Posts उत्तराखंड सोनम के आंदोलन पर राहुल ‘खामोश’

सोनम के आंदोलन पर राहुल ‘खामोश’

0
20
  • युवाओं की बात करने वाले राहुल गांधी, वांगचुक पर हैं चुप
  • सोनम की भूख हड़ताल पर राहुल गांधी की चुप्पी आखिर क्यों?

देहरादून। राजनीति में समय का बड़ा महत्व होता है। कब बोलना है, किस मुद्दे पर बोलना है और किस मुद्दे पर चुप रहना है यही किसी नेता की प्राथमिकताओं को तय करता है। इन दिनों कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी देशभर में छात्रों की गूंज अभियान के जरिए छात्रों से संवाद कर रहे हैं। वह शिक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी, पेपर लीक और युवाओं के भविष्य पर सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। तस्वीरें आ रही हैं, वीडियो वायरल हो रहे हैं और संदेश दिया जा रहा है कि कांग्रेस छात्रों की आवाज़ बनना चाहती है। लेकिन इसी दौरान देश के चर्चित शिक्षाविद सोनम वांगचुक छात्रों और व्यापक जनहित से जुड़े मुद्दों को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे हैं। शिक्षा सुधार और युवाओं के भविष्य पर वर्षों से काम करने वाला एक व्यक्ति सड़क पर बैठा है, लेकिन राहुल गांधी की ओर से अब तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। यही चुप्पी अब सबसे बड़ा सवाल बन गई है।
राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि मंच पर छात्र याद आते हैं, लेकिन सड़क पर बैठा शिक्षाविद नहीं। यदि छात्रों की बात करनी है तो क्या केवल राजनीतिक मंचों पर करनी है? क्या छात्र केवल तब महत्वपूर्ण हैं जब उनके बीच कैमरे लगे हों? क्या शिक्षा सुधार केवल चुनावी भाषणों का विषय है? और यदि नहीं, तो फिर सोनम वांगचुक के आंदोलन पर यह असहज मौन क्यों? राहुल गांधी अक्सर कहते हैं कि वह नफरत के खिलाफ मोहब्बत की राजनीति कर रहे हैं और जनता की आवाज सुन रहे हैं। लेकिन लोकतंत्र में केवल अपनी पसंद की आवाज सुनना संवाद नहीं कहलाता। असली लोकतंत्र तो तब है जब आप उन लोगों की भी सुनें, जो सत्ता से नहीं बल्कि व्यवस्था से सवाल पूछ रहे हों।
सोनम वांगचुक कोई अचानक सुर्खियों में आए आंदोलनकारी नहीं हैं। वे शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार के प्रतीक रहे हैं। उनका काम किताबों से ज्यादा प्रयोगशालाओं में दिखाई देता है। उन्होंने शिक्षा को रोजगार और जीवन से जोड़ने की बात की। ऐसे व्यक्ति की भूख हड़ताल पर यदि देश का सबसे बड़ा विपक्ष मौन रहे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। विडंबना देखिए, एक तरफ छात्रों की गूंज का मंच सजा है, दूसरी तरफ एक शिक्षाविद की भूख हड़ताल की गूंज सुनाई नहीं दे रही। क्या यह चयनात्मक संवेदनशीलता नहीं है? राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि विपक्ष जनता की आवाज होता है। लेकिन यदि विपक्ष भी केवल उन्हीं मुद्दों पर बोले, जहाँ राजनीतिक लाभ की संभावना हो, तो फिर सत्ता और विपक्ष के आचरण में अंतर क्या रह जाएगा?
यह प्रश्न केवल राहुल गांधी से नहीं, पूरे विपक्ष से है। आखिर शिक्षा पर गंभीर बहस कब होगी? क्या हर मुद्दा केवल सरकार को घेरने का औजार बनकर रह जाएगा? क्या शिक्षा सुधार पर कोई राष्ट्रीय सहमति नहीं बन सकती? इतना ही नहीं, यह सवाल सत्ता पक्ष से भी उतनी ही मजबूती से पूछा जाना चाहिए। यदि कोई प्रतिष्ठित शिक्षाविद भूख हड़ताल पर बैठा है, तो सरकार की भी जिम्मेदारी है कि संवाद करे। लोकतंत्र में किसी आंदोलन को नजरअंदाज करना समाधान नहीं होता। लेकिन विपक्ष से अपेक्षा इसलिए अधिक होती है क्योंकि उसका काम ही जनता के मुद्दों को उठाना है। यदि विपक्ष भी चुप रहेगा तो फिर लोकतंत्र में आवाज़ कौन उठाएगा?
आज का छात्र बहुत समझदार है। वह केवल भाषण नहीं सुनता, बल्कि नेताओं के आचरण को भी देखता है। वह पूछ रहा है जो नेता छात्रों की चिंता की बात करते हैं, क्या वे हर छात्र और हर शिक्षाविद की चिंता भी करते हैं? या फिर चिंता भी राजनीतिक सुविधा देखकर तय होती है? राजनीति में मौन कई बार शब्दों से ज्यादा बोलता है। राहुल गांधी यदि सोनम वांगचुक के आंदोलन से असहमत हैं, तो उन्हें सार्वजनिक रूप से अपना पक्ष रखना चाहिए। यदि सहमत हैं, तो समर्थन देना चाहिए। लेकिन चुप्पी… लोकतंत्र में सबसे कमजोर जवाब मानी जाती है। दिक्कत यह है कि आज राजनीति में मुद्दे नहीं, इवेंट ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं। संवाद भी वहीं होता है जहाँ कैमरे हों। धरना भी वहीं दिखाई देता है जहाँ राजनीतिक लाभ हो। बाकी मुद्दे धीरे-धीरे समाचारों की भीड़ में खो जाते हैं।
लोकतंत्र में छात्र किसी दल की संपत्ति नहीं होते। उनका भविष्य किसी विचारधारा का बंधक नहीं हो सकता। यदि शिक्षा वास्तव में राष्ट्रीय मुद्दा है, तो उस पर खड़े हर सवाल का जवाब भी राष्ट्रीय स्तर पर ही देना होगा। राहुल गांधी के सामने आज अवसर है कि वह इस चुप्पी को तोड़ें। यदि वे स्वयं को छात्रों का प्रतिनिधि मानते हैं, तो उन्हें उन शिक्षाविदों की आवाज़ भी सुननी होगी, जो वर्षों से शिक्षा सुधार की लड़ाई लड़ रहे हैं। अन्यथा छात्रों की गूंज का संदेश भी केवल राजनीतिक कार्यक्रम बनकर रह जाएगा। सवाल केवल इतना है क्या छात्रों की आवाज़ वहीं तक सुनी जाएगी, जहाँ तक कैमरे पहुँचते हैं? या फिर उस भूख हड़ताल की आवाज़ भी सुनी जाएगी, जहाँ लोकतंत्र अपनी संवेदनशीलता की परीक्षा दे रहा है?

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here