Home उत्तराखंड देहरादून बुरे फंसे ज्ञानेश कुमार

बुरे फंसे ज्ञानेश कुमार

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यह कहावत आपने भी सुनी होगी कि जब किसी आदमी का वक्त बुरा होता है तो ऊंट पर बैठे आदमी को भी कुत्ता काट लेता है। यह बात वर्तमान दौर में सत्ता में बैठी भाजपा सरकार पर सौ फीसदी सही साबित होती दिख रही है जिसने 11 साल सत्ता में रहते हुए संविधान और लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्था निर्वाचन आयोग तक को अपना मातहत बना लिया जिसके मुख्य आयुक्त ज्ञानेश कुमार को अपनी पत्रकार वार्ता के दौरान सरकार के लिए खुलकर बैटिंग करते हुए देखा गया। भले ही ज्ञानेश कुमार की इस बैटिंग को देखकर जिसमें वह राहुल गांधी को यह कहते हुए चुनौती दे रहे हैं कि वह अपने खुलासे पर या तो 7 दिन में शपथ पत्र दे या देश के लोगों से माफी मांगे। इस पर जब पत्रकारों ने पूछा कि अगर उन्होंने शपथ पत्र नहीं दिया तो इसके जवाब में ज्ञानेश कुमार कहते हैं की माफी तो उन्हें मांगनी ही पड़ेगी। उन्होंने इस सवाल का जवाब नहीं दिया कि अनुराग ठाकुर ने भी वैसा ही खुलासा किया है उनसे आपने शपथ पत्र क्यों नहीं मांगा। लेकिन ज्ञानेश कुमार को या सत्ता में बैठे उन लोगों को जो ज्ञानेश कुमार की चुनौती पर खुश हो रहे हैं उन्हें यह पता नहीं है इसका कितना बड़ा लाभ राहुल गांधी या विपक्ष को होने वाला है जिन 65 लाख वोटरों के नाम सूची से काटे गए थे वह 65 लाख वोट चुनाव आयोग व ज्ञानेश ने राहुल गांधी की झोली में डाल दिए। इन 65 लाख वोटो को राहुल से अब न जेडीयू छीन पाएगी और न बीजेपी। राहुल गांधी की वोट अधिकार यात्रा को जो बीते कल से शुरू हुई है कितनी सफलता मिलेगी यह तो चुनाव परिणाम ही बताएंगे लेकिन इस यात्रा में आने वाली भीड़ होश उड़ा देने वाली है। सोशल मीडिया पर इस आंदोलन की तुलना जेपी आंदोलन से अगर की जा रही है तो इसके पीछे की वजह को जानना जरूरी है जेपी का आंदोलन भी संविधान व लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई था और राहुल गांधी का आंदोलन का भी यही उद्देश्य है। लोगों ने अब यह मान लिया है कि राहुल सत्ता और व्यवस्था से ही नहीं लड़ रहे हैं बल्कि देश के उस मीडिया जो सत्ता की गोद में बैठा है तथा उस आरएसएस का जिसका जिक्र प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले से स्वतंत्रता दिवस पर अपने संबोधन में करते हुए उसे 100 साल पुराना एक एनजीओ बताया गया था जैसी ताकतों से राहुल अकेले ही सबसे लड़ रहे हैं। उनकी यह लड़ाई इसलिए भी ज्यादा मुश्किलों से भरी है क्योंकि सांगठनिक स्तर पर कांग्रेस अत्यंत ही कमजोर हो चुकी है। लेकिन उसके बावजूद भी वह इस लड़ाई को अगर एक आंदोलन तक ले जा चुके हैं तब सत्ताधारी नेताओं और राजीव कुमार तथा ज्ञानेश कुमार जैसे लोगों को भी यह समझ लेने की जरूरत है कि राहुल गांधी ने उस समय भी माफी नहीं मांगी थी जब उनकी सांसदी और सरकारी आवास तक छीन लिया गया था तो अब राहुल गांधी उनसे क्या माफी मांगेंगे? ठीक है कि सत्ता में बैठे लोगों ने निर्वाचन आयोग के आयुक्त की नियुक्तियाें व अधिकारों में फेर बदल कर इतना सशक्त कर दिया हो कि उनके खिलाफ न्यायालय में न जाया जा सके लेकिन ज्ञानेश कुमार कोई जज नहीं है जो उन्हें फांसी का हुक्म दे सके। अच्छा होता कि वह उन सवालों का जवाब देते जो देश जानना चाहता था वह भी पीएम मोदी की उस व्हाइट हाउस की एकमात्र पत्रकार वार्ता जिसमें उन्हें सिर्फ एक ही सवाल का जवाब देना था उसमें भी वह गोल—गोल बातें करते रहे कि हमारे लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों को समान अधिकार दिए गए हैं अब ज्ञानेश कुमार भी वैसा ही ज्ञान दे रहे हैं कि मत के अधिकार की रक्षा हर हाल में चुनाव आयोग करेगा।

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