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सवाल लोकतंत्र के अस्तित्व का

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क्या सत्ता और चुनाव आयोग ने आपसी सांठ—गांठ से देश के लोगों से उनके वोट के संवैधानिक अधिकार का अपहरण कर लिया गया और देश में इस आपराधिक षड्यंत्र को संगठित तरीके से अंजाम देने के लिए कोई बड़ा नेटवर्क तैयार किया जा चुका है, वर्तमान समय में वोट चोरी और एसआईआर को लेकर जो आंदोलन खड़ा हो चुका है वह तो इन्हीं संभावनाओं की ओर इशारा करता दिख रहा है। यह संभावनाएं बेवजह सर उठाये नहीं खड़ी हुई है। केंद्र सरकार द्वारा आयुक्तों की नियुक्तियों में नियमों को बदले जाने से लेकर नेता विपक्ष द्वारा कर्नाटक की एक ही विधानसभा क्षेत्र में एक लाख से अधिक फर्जी मतदाताओं का नाम दर्ज होने के खुलासे और एनसीपी नेता शरद पवार द्वारा उन्हें चुनाव जिताने का प्रस्ताव लेकर कुछ लोगों के संपर्क करने के दावे और चुनाव आयोग के उस रवैये जिसमें वह कोई जानकारी देने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक से साफ इनकार कर रहा है, उससे तो यही लगता है कि देश में अब निष्पक्षता से चुनाव नहीं हो रहे हैं। विपक्ष द्वारा इस मुद्दे को लेकर सवाल चुनाव आयोग पर उठाये जा रहे हैं लेकिन चुनाव आयोग की तरफ से बचाव के लिए सरकार और उसका मीडिया सेल जिस तरह से मैदान में उतर चुका है वह इस षड्यंत्र की संभावनाओं को और भी अधिक मजबूत करता है। विपक्ष अगर मतदाता सूचियों में भारी गड़बड़ी के सबूत उजागर कर रहा है और वह उसमें संशोधन की मांग कर रहा है तो इसमें चुनाव आयोग को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। वही बिहार में कराये जा रहे एसआईआर जिसमें 65 लाख वोटरों को वोट के अधिकार से बाहर किया गया है तो उनकी सूची जारी करने और मतदाताओं को इसकी वजह बताए जाने में भी चुनाव आयोग को क्या आपत्ति होनी चाहिए यह किसी की भी समझ से परे है। यह जानने का अधिकार हर एक नागरिक को है और यह अधिकार उन्हें देश का संविधान ही देता है। सच यह है कि इस अति गंभीर मुद्दे पर अब आयोग और सरकार लाख कोशिश कर ले अगर देश की जनता सड़कों पर उतरी तो उससे इस अधिकार को कोई नहीं छीन सकता है। इसे छीनने का सिर्फ एक मात्र जरिया अब तानाशाही ही शेष बचा है। जिसमें कोई संविधान मायने नहीं रखता है और न लोकतंत्र। लेकिन भारत के लोकतंत्र की जड़ कितनी मजबूत है यह हम 1970 के दशक में आपातकाल के समय देख चुके हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष सभी दलों के नेता यह बात को अच्छी तरह से जानते हैं। यह मुद्दा अब एक ऐसा मुद्दा बन चुका है इस पर आर पार का एक ऐसा निर्णायक आंदोलन छिड़ चुका है कि बिना फैसले के यह राजनीतिक जंग समाप्त नहीं होने वाली है। संविधान निर्माता और लोकतंत्र की परिकल्पना से देश का शासन प्रशासन चलाने वालों ने शायद कभी ऐसी विकट परिस्थितियों के बारे में सोचा भी नहीं होगा कि देश के नेता संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों को एक दिन इस हद तक तार तार कर देंगे कि आम आदमी लोकतंत्र और निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को इस तरह समाप्त कर देंगे। इतिहास भी ऐसे नेताओं को कभी माफ नहीं करेगा रही बात लोकतंत्र की तो इन नेताओं को यह अच्छे से समझ लेना चाहिए कि जीतेगा लोकतंत्र ही।

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