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सवालों में घिरी सरकार

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देश के नेता भले ही देश की जनता को बेवकूफ समझते हों क्योंकि अपने झूठे वायदों और झूठे भ्रमजाल में फंसा कर वह न सिर्फ उनका वोट बटोरने में कामयाब हो जाते हैं बल्कि सत्ता में आने पर अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल कर जनता के जीवन को सरल बनाने की बजाय और अधिक जटिलताओं में उलझाने का काम करते रहे है। लेकिन सच यह है कि देश की जनता बेवकूफ नहीं है। वह ऐसे नेताओं को एक दिन कहीं का भी नहीं छोड़ती है। बीते लोकसभा चुनाव के बाद भले ही केंद्र की नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में तीसरी बार भाजपा की सरकार बन गई हो लेकिन यह सरकार जनता के आदेश से नहीं जोड़—तोड़ और जुगाड़ से बनी सरकार ही है। यही कारण है कि इस सरकार के गठन के बाद से ही इसके भविष्य को लेकर चर्चाएं लगातार जारी रही हैं। जिनका अंत तब तक नहीं होगा जब तक यह सरकार अस्तित्व में रहेगी। मानसून सत्र की शुरुआत से पूर्व ही इस बात की आशंकाएं जाहिर की जा रही थी कि इस सत्र में सरकार को विपक्ष का सामना करना अत्यंत ही मुश्किल होगा। विपक्ष के पास ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम में आतंकियों द्वारा किए गए नरसंहार पर ही 100 सवाल करने को नहीं थे, इसके साथ—साथ कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच जो सर्वाेच्चता की जंग छिड़ चुकी है जिसमें राष्ट्रपति भवन को 14 सवाल वाले पत्र के जरिए घसीट लिया गया वह कोई सामान्य घटना नहीं थी। राष्ट्रपति का सर्वाेच्च न्यायालय से यह पूछा जाना की क्या वह राष्ट्रपति को भी आदेश दे सकता है, जैसे गंभीर सवालों के जवाब अब देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिया जा चुका है। संविधान की व्यवस्था और गरिमा को बनाए रखने के लिए वह राष्ट्रपति को भी आदेशित करने का अधिकार रखता है। और संविधान से ऊपर कोई भी नहीं हो सकता न वह कार्य पालिका जिसमें बैठे सांसदों द्वारा सुप्रीम कोर्ट के लिए सुप्रीम कोठा जैसे अपशब्दों का इस्तेमाल किया जाना और न ही वह राष्ट्रपति भवन जो किसी विधेयक को जब तक चाहे दबाकर रख लेता था। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के आकस्मिक इस्तीफा के बाद विपक्ष के सवालों की सूची, बिहार में मतदाता सूची में कराई जा रहे विशेष पुर्ननिरीक्षण से भी अब दो कदम और आगे बढ़ गई है। जस्टिस वर्मा पर महाभियोग पर चर्चा के प्रस्ताव को राज्यसभा में स्वीकार किया जाना और इस अग्निकांड में जली भ्रष्टाचार की वह रकम जिसे लेकर हंगामा खड़ा हुआ किसकी थी? कहां से आई इसका सच उस सरकार को सामने लाना ही चाहिए जो भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का दावा करती रही है। इन तमाम घटनाओं के बीच भाजपा की सरकार द्वारा किए गए 15 लाख देने, काला धन वापस लाने, लोकायुक्त का गठन करने, दो करोड़ हर साल रोजगार देने की बातों को न विपक्ष भूला है न देश की जनता। नोटबंदी से हुए नफा नुकसान और जीएसटी से देशवासियों को निचोड़ने के मुद्दों के साथ—साथ विपक्ष के पास देश की संवैधानिक संस्थाओं को अस्तित्वहीन बनाने जैसे तमाम मुद्दे अब और भी धारदार हो चुके हैं। ईडी जिसकी कार्रवाई को सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा गलत ठहराया जा चुका है, चुनाव आयोग जिसके पास किसी सवाल का कोई जवाब नहीं है। वर्तमान सरकार को बड़े संकट में लाकर खड़ा कर चुका है। सरकार अब इन तमाम हालातो और भाजपा की दलगत राजनीति से कैसे उभर सकेगी देखना दिलचस्प होगा। यही तमाम बातें अब भाजपा सरकार का भविष्य तय करने वाली है।

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