भारत देश इसकी सभ्यता और संस्कृति उसकी राजव्यवस्था जिसे हम लोकतंत्र कहते हैं उसका संविधान और समाज जिसे लेकर तमाम बड़ी—बड़ी बातें की जाती हैं। सचमुच बहुत अनूठा और अद्भुत है। यहां फिलहाल हम लोकतंत्र के उसे स्वरूप की बात करेंगे जो आम आदमी के वोट के अधिकार पर टिका है जो हर एक नागरिक को हमारे संविधान द्वारा दिया गया है। इस वोट की कीमत और महत्व क्या होता है हम इस बात से भी समझ सकते हैं कि इस वोट से ही कोई राजनीतिक दल और उसके नेताओं को हुकूमत का अधिकार मिलता है। वोट की ताकत किसी से भी सत्ता छीन सकती है और किसी को भी सत्ता सौंप सकती है। लेकिन यह विडंबना ही है कि इस वोट को हासिल करने के लिए वर्तमान काल के नेता और राजनीतिक दल जन सरोकारों की बजाय झूठा भ्रम और लोभ लालच का सहारा लेने को राजनीति मान बैठे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले तमाम चुनावों में भी बीते एक दो दशक से जिन मुफ्त की रेवड़ियों के बांटे जाने का शोर सुनते आ रहे हैं उनसे हम सभी अच्छी तरह से वाकिफ हैं खास बात यह है कि मुफ्त की रेवड़िया बांटे जाने का यह खेल सभी दलों और नेताओं द्वारा किया जा रहा है। यह बात अलग है कि इसका आरोप यह सभी दल एक दूसरे पर लगाते रहते हैं। एक दूसरा सच यह है कि देश के आम व गरीब मतदाताओं को मुफ्त की रेवड़ियों की एक ऐसी लत लगा दी गई है या फिर उनकी एक ऐसी मजबूरी बना दी गई है कि उसे यह लगने लगा है कि बिना इन मुफ्त की सुविधाओं के उनका जीवन दुभर हो जाएगा। सही मायने में यह देश की गरीब जनता को गरीब बनाए रखने का एक ऐसा षड्यंत्र है जिससे वह बाहर निकल पाए यह कोई दल नहीं चाहता है। 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन की बात हो या फ्री बिजली—पानी और स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने की या फिर बच्चों को मिड डे मील से लेकर छात्र—छात्राओं को साइकिल और लैपटॉप बांटने की या मुफ्त घर और गैस कनेक्शन देने की देश में मुफ्त की सेवाएं देने की एक स्पर्धा शुरू हो चुकी है। जिसका असर छोटे से छोटे चुनावों तक देखा जा सकता है। उत्तराखंड में हो रहे पंचायत चुनावों में अभी रुद्रप्रयाग जिले के एक गांव का वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक बर्तनों से भरे ट्रक से बर्तन बांटे जा रहे हैं। जिसमें एक संदेश भी दिया गया है कि वोट के बदले यह बर्तन आपके लिए। सवाल यह है कि क्या इस देश के लोकतंत्र की कीमत अब सिर्फ एक बर्तन रह गई है क्या लोग इस कदर लालची व मजबूर हो चुके हैं कि वह एक बर्तन के बदले अपना वोट किसी को भी दे सकते हैं? चुनाव में नोट बांटने से लेकर मुफ्त की दारू और मीट—भात सपोड़ने की बात तो आपने पहले भी सुनी होगी अगर लोकतंत्र की यही कीमत शेष बची है तो आप खुद सोचिए कि क्या आपका लोकतंत्र जिसे आप दुनिया का सबसे बड़ा और पुराना लोकतंत्र बताते हैं गर्व करने के काबिल है।




