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बोतल से बाहर आया जिन्न

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सियासत भी क्या अजब—गजब चीज है भले ही कोई घटनाक्रम कितने भी समय पूर्व घटित हुआ हो लेकिन बोतल से बाहर आने वाले जिन्न की तरह कभी भी कोई भी घटनाक्रम सामने आकर खड़ा हो सकता ह,ै इसका कुछ भरोसा नहीं होता। उत्तराखंड की सियासत में भूचाल ला देने वाली उसे दल—बदल की घटना को 9 साल का समय बीत चुका है जब कांग्रेस के 9 बड़े नेता पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के नेतृत्व में कांग्रेस छोड़कर भाजपा के साथ चले गए थे और तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार संकट में फस गई थी। इस दल—बदल की घटना के कारण उत्तराखंड को पहली बार राष्ट्रपति शासन की त्रासद स्थिति को झेलना पड़ा था वहीं हरीश रावत के एक स्टिंग ऑपरेशन जिसमें वह सत्ता के लिए सौदेबाजी करते दिखे थे कांग्रेस की साख को ऐसी आंधी में फेंका कि उससे सूबे की कांग्रेस और हरीश रावत आज तक नहीं उबर सके हैं 9 साल बाद सीबीआई ने इस दल—बदल और स्टिंग को लेकर कांग्रेस के पूर्व नेताओं जिनमें से कुछ वर्तमान सरकार में भी मंत्री और विधायक है नोटिस जारी कर पूछताछ के लिए तलब किया गया है। यानी की 9 साल बाद एक बार फिर अगर इस घटना का जिन्न बोतल से बाहर आ गया है तो यह बेवजह तो नहीं हो सकता है। इस समय इसे लेकर जिस तरह से सीबीआई एक्शन में दिखाई दे रही है उससे यह साफ प्रतीत होता है कि इसके जरिये फिर कुछ न कुछ बड़ी उठा पटक होगी। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा भी आम है कि सीबीआई के इस एक्शन का उद्देश्य सूबे के कुछ बहुत पुराने नेताओं जिनमें हरीश रावत, सतपाल महाराज और हरक सिंह रावत से लेकर कुछ नए नेताओं के नाम भी शामिल है। जिन्हें राजनीतिक स्तर पर ठिकाने लगाने की रणनीति है। कांग्रेस सरकार के कार्यकाल की इस घटना का कांग्रेस पर जो प्रभाव पड़ा था वह तो हम सभी के सामने हैं ही क्योंकि इसके बाद हुए तमाम चुनावों में उसे फजीहत ही झेलनी पड़ी है लेकिन व्यक्तिगत तौर पर नफा नुकसान की बात की जाए तो इसके प्रभाव से कोई भी नेता शेष नहीं बचा है जिसको इसका घटनाक्रम का कोई न कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष परिणाम भारी नुकसान के रूप में न उठाना पड़ा हो जो इस घटना के प्रमुख सूत्रधार माने जाते हैं। वह भले ही अपना दुख दर्द किसी के साथ शेयर करें न करें लेकिन उन्हें भी गुजरते समय के साथ इस बात का थोड़ा बहुत एहसास तो जरूर हुआ है ही है कि कहीं न कहीं गलती तो उनसे हुई है। पूर्व सीएम विजय बहुगुणा हो या हरीश रावत अथवा डा. हरक सिंह रावत जिनका हाल यह हो गया है कि न इधर के रहे न उधर के उनके अलावा भी तमाम लोग है जो अब कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं है। देखना यह है कि 9 साल बाद बोतल से बाहर आया यह जिन्न अब सूबे की राजनीति में क्या कुछ नए गुल खिलाता है अभी तो यह नेता सीबीआई के सामने जाने से बचते ही दिखाई दे रहे हैं लेकिन यह कब तक संभव होगा।

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