Home संपादकीय संघीय ढांचे को ढहाने की कोशिश

संघीय ढांचे को ढहाने की कोशिश

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क्या देश की जांच एजेसिंया और संवैधानिक स्वायतता धारी संस्थाओं के दुरूपयोग का मुद्दा उस हद को पार कर चुका है। जहंा संविधान व लोकतंत्र समाप्त होने की कगार पर पहुंच जाता है? यह सवाल हम नहीं उठा रहे है। बीते कल देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट द्वारा कही गयी वह टिप्पणी कर रही है। जिसमें एक मामले की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस बी आर गवई के नेतृत्व वाली बैंच द्वारा ईडी को लेकर की गयी है। सुप्रीम कोर्ट की बैंच ने यह टिप्पणी तमिलनाडू में तथा कथित शराब घोटाले की जांच को लेकर की है। कोेर्ट का कहना है कि आपने तो सारी हदेंं पार कर दी है। आपके द्वारा की जाने वाली कार्यवाही देश के संघीय ढांचे को समाप्त करने वाली है। निश्चित तौर पर सुप्रीम कोर्ट यह टिप्पणी इस बात को रेखांकित करने वाली है जहंा न संविधान का कोई महत्व रह जाता है और न लोकतंत्र का कोई मतलब शेष बचता है। यूं तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा बीते समय में ईडी की कार्यवाही को लेकर एक नहीं अनेक बार कड़ी फटकार लगाई जाती रही है। लेकिन इससे पूर्व इतनी गम्भीर टिप्पणी कभी नहीं की गयी है। अदालत द्वारा यह टिप्पणी उस समय की गयी जब बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं द्वारा आरोपियाें के मोबाइल फोन की क्लोनिंग किये जाने का मामला उठाते हुए संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकाराें को हनन करार दिया तथा आम आदमी की निजता पर हमला बताया। ईडी की इस कार्यवाही पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह सख्त टिप्पणी की गयी। ईडी की कार्यवाही किस तरह की है इसे लेकर शायद किसी उदाहरण की जरूरत नहीं है। दिल्ली कें तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री सोरेन की गिरफ्तारी को लेकर दर्जनो नाम ऐसे है जिन्हे बिना किसी पुख्ता सबूत के ईडी ने न सिर्फ जेलों में ठूंस दिया बल्कि सालों तक जेल की हवा खाने पर विवश कर दिया गया। किसी भी गवाह द्वारा दी गयी जानकारियों को आधार बनाकर की जाने वाली इन तमाम सारी गिरफ्तारियों के बाद महीनों और सालों तक चार्जशीट दाखिल न करने औैर सबूत जुटाने के नाम पर खेला किये जाने और अंत में कोई सबूत न पेश किये जाने पर उन्हे जमानत पर रिहा किये जाने से कितने लोगो ंका राजनीतिक भविष्य चौपट हो गया है। यही नहीं ईडी का भूत किसी के भी पीछे छोड़ दिये जाने का भय इतना कि न जाने कितने नेता अपनी पार्टी छोड़ कर भाजपा में चले गये। इसका कोई आदि और अंत नहीं है। विपक्षी दलों को समाप्त करने मेंं ईडी ने जो भूमिका निभाई है। वह जगजाहिर है। सवाल यह है कि अपने खिलाफ कुछ भी बोलने वाले नेताओं को चुप कराने का इससे बेहतर क्या कोई औजार हो सकता है। यह सब किसने किया? और क्यों किया? इस पर कुछ कहने की जरूरत भी नहीं रही है। ईडी के डायरेक्टर पद पर पांच बार तक सेवा विस्तार पाने वाले मिश्रा को तब उनके पद से हटाया गया था कि जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि क्या आपके पास उनके मुकाबले का कोई दूसरा योग्य व्यक्ति नही है। बात चाहे ईडी की हो जिसे आये दिन कोर्ट द्वारा लताड़ा जाता है लेकिन उसकी कार्य प्रणाली में कोई सुधार होता हुआ नहीं दिखता है। चाहे सीबीआई को सरकार का तोता कहा जाता है। अथवा इलेक्शन कमीशन जिस पर मिनटों में वोटिंग प्रतिशत को अप्रत्याशित रूप से बढ़ाने और किसी को चुनाव जिताने और हराने का आरोप लगाया जाता रहा है। तमाम संवैधिानिक संस्था और जांच एजेंसियों पर अगर इस तरह शिंकजा कसा जा चुका है कि वह सिर्फ सरकार के लिए ही काम करें तो फिर हम किस तरह के लोकतंत्र की कल्पना कर सकते है।

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