उत्तराखंड राज्य को अस्तित्व में आए 25 साल का समय हो चुका है। भले ही राज्य में तमाम क्षेत्रों में कितना भी काम हुआ हो लेकिन राज्य में जो समस्याएं 25 साल पहले थी वह आज भी जस की तस बनी हुई है। राज्य से होने वाला पलायन एक ऐसा ही अहम मुद्दा है जो बेरोजगारी और मूल सुविधाओं के अभाव से जुड़ा हुआ है। अगर राज्य में समुचित तरीके से विकास हुआ होता और मूलभूत सुविधाएं विकसित की गई होती तो लोगों को राज्य से बाहर जाने की क्या जरूरत होती। पहाड़ के लोगों को सेना में भर्ती के जो अवसर मिलते थे उनमें अग्निवीर जैसी योजनाओं के कारण कमी आई है। राज्य गठन के बाद अगर सरकारी विभागों में नौकरी के थोड़े से अवसर बढ़े भी तो उनका फायदा बैकडोर भर्तियों वालों को मिल सका। अब 25 साल बाद सरकार को इस बात की सुध आई है कि उसने जो आउटसोर्स और संविदा भर्तियों की राह पकड़ी थी वह किस खतरनाक मोड़ पर आ चुकी है। 25 सालों में राज्य में जो भर्तियंा हुई उन नौकरियों को लोग या तो नकल माफियाओं के जरिए हासिल कर सके या फिर आउटसोर्स और संविदा के जरिए जोर जुगाड़ लगाकर। नतीजा यह रहा कि जो युवा दिन—रात पढ़ाई करने और प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए नौकरी पाने के लिए कसरत करते रहे उन्हें निराशा ही हाथ लगी। अब भले ही नकल पर रोक लगाने के लिए सख्त कानून बन गए हो और संविदा तथा आउटसोर्स भर्तियों पर रोक लगा दी गई हो लेकिन इन 25 सालों में 50 से 60 हजार लोगों को उपनल, आउटसोर्स, संविदा और तदर्थ कर्मचारियों के रूप में नौकरियां दी गई है जो सरकार के लिए एक बड़ी समस्या बन चुकी है। भले ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा उपनल के माध्यम से नौकरी पाने वाले 18—20 हजार लोगों को नियमित करने के लिए ठोस नीति बनाने की बात कही जा रही हो लेकिन सवाल सिर्फ उपनल कर्मियों का ही नहीं है उन तमाम कर्मचारियों का भी है जो 10—15 साल से अधिक समय से सेवा कर रहे हैं। सरकार इनका रोजगार छीन कर उन्हें भूखे मरने के लिए तो नहीं छोड़ सकती है। तमाम विभागों में काम करने वाले यह कर्मचारी इसे लेकर अदालतों का दरवाजा खटखटाते रहे हैं और उन्हें स्टे भी मिलता रहा है। 25 सालों में विभिन्न तरीकों से नौकरी में रखे गए इन लोगों का समायोजन आसान नहीं है क्योंकि नियमितीकरण के बाद वह हर उस सुविधा के अधिकारी हो जाएंगे जो एक सरकारी कर्मचारियों को प्रदान की जाती है क्या सरकार इस वित्तीय बोझ को उठाने के लिए तैयार हो सकती है। एक अन्य बात यह है कि समायोजन या नियमितीकरण की बात कह तो दी गई लेकिन इस पर अमल कब तक हो पाएगा और कैसे होगा यह भी एक सवाल है। रोजगार के लिए कितनी मारामारी है और नकल रोधी कानून नकल को रोकने में कितना सफल हुआ है इसका उदाहरण है। बीते कल नवोदय स्कूलों में नॉन टीचिंग पदों पर भर्ती के लिए होने वाली परीक्षा थी जिसमें दून में 17 युवक सामूहिक नकल करते पकड़े गए जिन पर मुकदमा दर्ज हुआ है। एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य के तमाम सरकारी विभागों में अभी भी 65—66 हजार पद खाली पड़े हैं लेकिन सरकार इन्हें भर नहीं पा रही है। भर्ती चयन आयोग से ही होगी यह तो ठीक है लेकिन भर्ती कब होगी या क्यों नहीं हो रही है? इस सवाल का कोई जवाब किसी के पास नहीं है। राज्य के युवा अभी भी रोजगार के लिए भटकते फिर रहे हैं राज्य से वह पलायन करने पर विवश है लेकिन न तो आउटसोर्स व संविदा से हुई भर्तियों के नियमितीकरण का कोई रास्ता निकल पा रहा है और न हीं भर्तियो की राह आसान हो पा रही है। जिसे लेकर युवा बेरोजगारों में बेचैनी होना स्वाभाविक ही है।




