यह बात भले ही थोड़ी अटपटी लगेगी तुष्टिकरण राजनीति साधने का एक ऐसा टूल है जिसका प्रयोग सभी राजनीतिक दल और नेताओं द्वारा बेझिझक किया जाता रहा है। यह बात अलग है कि सभी दल और नेता एक दूसरे पर तुुष्टिकरण या फिर सांप्रदायिकता की राजनीति करने के आरोप लगाये जाते रहते हैं तथा अपने दामन के साफ सुथरा होने के दावे किए जाते हैं। देश की राजनीति में आपने सामाजिक स्तर पर कितने ही तरह के वर्गीकरण देखें और सुने होंगे। जातियों के भीतर भी वर्गीकरण तक और हिंदू—मुस्लिम की राजनीति से लेकर स्वर्ण और पिछड़ी जातियों की राजनीति का दौर अब पीछे छूट चुका है क्योंकि राजनीतिक दलों द्वारा वर्गीकरण के तमाम नए—नए तरीके क्षेत्रवार नेताओं द्वारा तलाश कर लिए जाते हैं। उत्तराखंड में इन दिनों पहाड़ी और मैदानी के मुद्दे पर छिड़ी सियासी जंग इसका ताजा उदाहरण है। खास बात यह है कि हमारे नेताओं के पास एक से बढ़कर एक ऐसे तीर हैं वह इस सामाजिक विभाजन के लक्ष्य पर एकदम सटीक निशाना साधने में कतई भी नहीं रह सकते हैं अभी बीते दिनों सोशल मीडिया पर एक यूकेडी की महिला नेत्री लोगों से खुकरी निकालने और मैदान के लोगों की गर्दन काटने तक की अपील करते देखी गई थी। यह दीगर बात है कि किसी की भी गर्दन काटना इतना भी आसान नहीं होता है जितना आसानी से यह बात कह दी गई। लेकिन इस तरह के भड़काऊ भाषण या बयान किसी भी राज्य, क्षेत्र के सामाजिक माहौल को बिगड़ने के लिए काफी होते हैं। बात सिर्फ उत्तराखंड राज्य की नहीं है जहां बीते कुछ समय से हिंदू—मुस्लिम तो हो ही रहा है। पहाड़ और मैदान के लोगों के बीच विभाजन की लकीर खींचने की कोशिशें की जा रही है। राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह की तमाम घटनाएं घटित हो रही है। अभी हाल ही में लाये गए केंद्र सरकार द्वारा वक्फ बोर्ड विधेयक को लेकर तुष्टिकरण की राजनीति चरम पर देखी जा रही है। असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं द्वारा सरकार को समर्थन देने वाले टीडीपी और जदयू जैसे दलों के नेता चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार से यह अपील की जा रही है कि इस बिल के माध्यम से केंद्र सरकार मुसलमानों से मस्जिदों मदरसों व मजारों पर कब्जा करने की कोशिशे की जा रही है अगर इस बिल पर उन्होंने सरकार को समर्थन दिया तो आने वाली पीढ़ियां भी उन्हें माफ नहीं करेंगे और उनके हक मारने के लिए वही जिम्मेदार होंगे। क्योंकि बिना उनके सरकार यह बिल पास नहीं करा सकती है। आंध्र प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक स्थिति में है तथा उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य जहां समाजवादी पार्टी का वजूद मुस्लिम वोटरों पर टिका हुआ है वहां के नेता भले ही अभी चुप्पी साधे हो और केवल अखिलेश यादव ही स्पष्ट तौर पर कह रहे हो कि वह ऐसा किसी भी कीमत पर नहीं होने देंगे। तुष्टिकरण की राजनीति का एक ऐसा मुद्दा बन चुका है जहां अब या तो केंद्र सरकार इस बिल को ठंडे बस्ते में डालने पर विवश होगी या नायडू व नीतीश केंद्र सरकार से समर्थन वापस लेने पर मजबूर होंगे। भले ही इसका फैसला अभी भविष्य के गर्भ में छिपा हो लेकिन इसमें कोई संशय नहीं है कि तुष्टिकरण का राजनीति के दम पर ही भाजपा की केंद्र में सरकार है तथा दूसरे सभी दल भी तुष्टिकरण की राजनीति को ही सत्ता तक पहुंचने का जरिया मानते हैं। यह बात अलग है कि इस तुष्टिकरण की राजनीति ने देश के समाजवाद, एकता तथा भाईचारे को खंड—खंड कर दिया है।




