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बच्चों के भविष्य पर भारी मोबाइल

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कहा जाता है कि परिवार व्यक्ति की पहली पाठशाला होता है तथा मंा किसी भी बच्चे की पहली गुरु होती है। निःसंदेह आप में से हर किसी ने अनेक ऐसी कहानी पड़ी या सुनी होगी जिसमें एक परिवार के परिवेश का प्रभाव बच्चों के मन मस्तिष्क पर पड़ने वाले प्रभाव को दर्शाता है या फिर मां द्वारा अबोध बच्चे को दी जाने वाली शिक्षा का उसके जीवन और व्यक्तित्व पर क्या प्रभाव पड़ता है? एक व्यक्ति जो चोरी के आरोप में जेल जाता है और अदालत जब उसे फांसी की सजा सुना देती है तथा फांसी से पूर्व जब उस व्यक्ति से उसकी अंतिम इच्छा पूछी जाती है तो वह अपनी मां से मिलने की इच्छा जाहिर करता है। मां जब उससे मिलने आती है तो वह व्यक्ति अपनी मां से कान में कुछ कहने जाता है तो दांतों से उसका कान काट लेता है यह देखकर सभी हैरान होते हैं। उसे जब इसका कारण पूछा जाता है तो वह बताता है कि स्कूल से पहली बार किसी की कलम चुराने पर मां ने अगर उसे प्रोत्साहित करने की बजाय रोका होता तो आज उसे फांसी की सजा नहीं होती। लेकिन आज के दौर के बच्चे सिर्फ परिवार और मंा से ही सब कुछ नहीं सीख रहे हैं। उनके आसपास के परिवेश उनके साथी और दोस्तों के अलावा टेक्नोलॉजी भी बहुत कुछ सिखा रही है। खास तौर से एकमात्र मोबाइल फोन ही बच्चों के जीवन को कहीं से कहीं तक प्रभावित करने का एक बड़ा जरिया बन चुका है। खास बात यह है कि कोरोना काल के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई की जरूरत ने अबोध बच्चों के हाथों में एंड्रॉयड मोबाइल फोन पहुंचा दिया जो बच्चों के लिए बड़ा अभिशाप साबित हो रहा है। इस नई तकनीक ने बाल्यावस्था में ही बच्चों को युवा और प्रौढ़ बनाने में अहम भूमिका निभाई है। मोबाइल में बच्चे वह सभी कुछ देख रहे हैं जो दो दशक पहले युवावस्था में पहुंचने के बाद भी लोग नहीं जान पाते थे। मोबाइल में वह जो कुछ भी देख रहे हैं तथा ऐसा कुछ भी देख रहे हैं जो उस उम्र के बच्चों के देखने योग्य नहीं है वह उनके आचरण में तेजी से उतरता जा रहा है। बीते कल देश के एक राज्य उड़ीसा के एक गांव से एक ऐसी दिल दहला देने वाली वारदात सामने आई जो मन को झकझोर देने वाली है। एक युवक द्वारा ऑनलाइन गेम खेलने से रोकने पर अपने माता—पिता और बहन की हत्या कर दी गई। यह एक उदाहरण मात्र है हर रोज बच्चों के घर से भाग जाने की तथा आत्महत्या करने की, रेप और चोरी जैसे जगन्य अपराधों को अंजाम देने की घटनाएं खबरों में बनी रहती हैं। बच्चों में नशावृति और अपराधी प्रवृत्ति के पनपने के पीछे भी मोबाइल एक बड़ा कारण बन चुका है। नशे और गेमिंग की लत ने इन बच्चों का भविष्य जिस तरह और जितने व्यापक स्तर पर प्रभावित किया है वह अत्यंत ही चिंतनीय विषय बन चुका है। मोबाइल के कारण दिशा भ्रमित हुए इन बच्चों की हरकतें आज 80 फीसदी परिवारों के लिए एक बड़ी समस्या बन चुकी है अगर मां—बाप बच्चों को इससे दूर रखने का प्रयास करते हैं तो वह मां—बाप की जान तक ले लेते हैं और अपनी जान देने में भी नहीं चूकते। दून में एक गरीब सब्जी विक्रेता ने जब अपनी कक्षा 8 में पढ़ने वाली बेटी को एंड्रॉयड फोन दिलवाने में असमर्थता जताई तो बेटी ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। हालत इतने विकराल और चिंतनीय हो चुके हैं कि स्कूल जाने से पूर्व ही तीन—चार साल तक के बच्चों को मोबाइल पर कार्टून और गेम में सबसे अधिक रुचि लेते देखा जा सकता हैं। यह सच है कि इन बच्चों को मोबाइल से दूर नहीं रखा जा सकता है लेकिन जिस तरह मोबाइल फोन इन बच्चों के भविष्य पर भारी पड़ रहे हैं परिवार के लिए मुसीबत का सबब बन चुका है। उसके उपाय तलाशने की जरूरत है क्योंकि यह समस्या अति गंभीर ही नहीं अत्यंत व्यापक बन चुकी है।

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