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बर्फ में दबी जिंदगियां

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विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले हिमालयी राज्यों में आने वाली आपदाओं से हर साल भारी जान—माल का नुकसान होता है। 2013 की केदारनाथ आपदा जैसी बड़ी घटनाएं भले ही गिनी चुनी हो जिनमें हजारों की संख्या में लोग हताहत हुए थे। लेकिन बीते कल चमोली जनपद के माणा के निकट हिमस्खलन जैसी घटनाएं तो आमतौर पर घटित होती रहती हैं। बीते कल बद्रीनाथ के पास हुई एवलांच की घटना में 57 लोगों के बर्फ में दब जाने की खबर ने एक बार फिर 2021 में चमोली के रैणी ग्लेशियर टूटने की उसे घटना की यादों को ताजा कर दिया है जिसमें 206 लोगों की जान चली गई थी। बीआरओ के इन मजदूरों को भारत—चीन सीमा में ऋषि गंगा नदी ने निगल लिया था। तथा उनके शव भी बरामद नहीं किया जा सके थे। बॉर्डर की सड़कों को सुरक्षित रखने का काम करने वाले इन कर्मचारियों का कार्य निसंदेह अत्यंत जोखिमपूर्ण और कठिन है। कल माणा में जिन 57 मजदूरों पर बर्फ का पहाड़ टूट कर गिरा उनमें से 46 लोगों को बचाने की जानकारी अभी तक शासन स्तर पर दी गई है तथा 8 लोग अभी भी लापता है। बर्फ में दबे इन मजदूरों को सुरक्षित बचाने के प्रयास युद्ध स्तर पर किए जा रहे हैं लेकिन दुर्घटना स्थल की विषम परिस्थितियों के कारण बचा हुआ राहत कार्य किया जाना मुश्किल प्रतीत हो रहा है। घटनास्थल के 20 किलोमीटर के दायरे में चार से पांच फीट तक बर्फ जम चुकी है। आवागमन के रास्ते अवरुद्ध होने तथा लगातार जारी भारी बारिश और बर्फबारी के कारण इन मजदूरों तक पहुंच पाना भी मुश्किल हो पा रहा है। बचाव राहत के लिए भेजी जाने वाली एनडीआरएफ की टीमें भी अभी रास्ते में रुक कर मौसम साफ होने की प्रतीक्षा कर रही है। जबकि इस दुर्घटना के 36 घंटे का समय अब तक बीत चुका है बर्फ के नीचे दबी यह 8 जिंदगियां कितने समय तक जिंदगी की जंग लड़ पाएगी यह चिंता अब सभी को सता रही है क्योंकि मौसम के अभी सुधरने की संभावना दिखाई नहीं दे रही है। हालांकि मौसम विभाग द्वारा मौसम का मिजाज बिगड़ने की जानकारी 48 घंटे पहले ही दी जाती है इसके बावजूद भी जिस तरह का यह हादसा पेश आया है वह कहीं न कहीं बीआरओ के ठेकेदारों की लापरवाही को दर्शाता है। ऐसी आपदाओं के सामने मानवीय सतर्कता और राहत तथा बचाव के सभी प्रयास बौने साबित हो जाते हैं। यह ठीक है कि प्राकृतिक आपदाओं पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं है लेकिन जिन आपदाओं का पूर्वानुमान होता है उनसे थोड़ी सतर्कता के जरिए कुछ हद तक तो बचाव किया ही जा सकता है। फरवरी माह के अंत में मौसम की यह बदमिजाजी राज्य में चल रही चार धाम यात्रा की तैयारियों में बाधा बन गई है। मौसम खराब रहने की संभावनाओं के कारण 27 फरवरी के पीएम के मुखवा दौरे को स्थगित कर दिया गया था। थोड़ी अतिरिक्त सतर्कता बढ़ायी गई होती तो शायद इस हादसे के नुकसान को भी कम किया जा सकता था। लेकिन अब जो कुछ होना था हो चुका है इसलिए अब इन मजदूरों की सलामती व सकुशल वापसी की सिर्फ दुआएं ही की जा सकती है।

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