संवैधानिक संस्थाओं का कार्यकाल समाप्त होने तक अगर नए चुनाव के जरिए नए सदस्यों का निर्वाचन किसी कारणवश नहीं हो पता है तो इन संस्थाओं का कार्य सुचारू रूप से संचालित करने के लिए प्रशासकों की नियुक्ति का प्रावधान है। लेकिन अगर संस्था या संस्थाओं के पूर्व पदाधिकारियों को ही प्रशासक नियुक्त कर दिया जाना कितना उचित है उत्तराखंड में आजकल इस मुद्दे को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच घमासान की स्थिति बनी हुई है। क्योंकि राज्य सरकार ने पंचायतों में जिला पंचायत की जगह पूर्व जिला पंचायत अध्यक्षों को ही प्रशासक नियुक्त कर दिया गया है सवाल यह है कि अगर पूर्व मेयर या जिला पंचायतों के अध्यक्षों को इस अपने पद पर कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी बनाए रखा जा सकता है तो फिर प्रशासकों की नियुक्ति के इस प्रावधान की जरूरत ही क्या थी? क्यों पंचायत एक्ट में प्रशासकों की नियुक्ति के प्रावधान को रखा गया है। उत्तराखंड राज्य में कुल 13 जिले हैं जिनमें से हरिद्वार जिला पंचायत को छोड़कर बाकी 12 जिलों की पंचायतों का कार्यकाल बीते नवंबर माह में समाप्त हो चुका है। पहले तो सरकार नगर निगम की तरह राज्य में पंचायत के चुनाव सही समय पर कराने में असमर्थ या विफल रही वहीं अब कार्यकाल समाप्त होने पर भी इन पंचायतों में पूर्व जिला पंचायत अध्यक्षों को ही प्रशासक के रूप में नियुक्तियां देकर उन्हीं को इसका लाभ दे दिया गया। विपक्ष कांग्रेस का कहना है कि यही सब करना था तो फिर सरकार निगमों में मेयरो को ही प्रशासक नियुक्त कर देना चाहिए वहां प्रशासनिक अधिकारियों को बैठाने की भी क्या जरूरत थी राज्य के पिछले पंचायत चुनाव में भाजपा का दबदबा रहा था वह 13 में से 9 जिलों में अपने पंचायत अध्यक्ष चुने जाने में सफल रही थी जिनकी संख्या अब बढ़कर 10 हो गई है। कुल मिलाकर भाजपा ने कुल 12 में से 10 जिला पंचायत अध्यक्षों के कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी अपने पद पर बने रहने का अवसर दे दिया है। चुनाव कितने समय बाद हो पाते हैं अलग बात है लेकिन इन पंचायतों पर जब तक चुनाव नहीं होते इन पर प्रशासकों के रूप में भाजपा का ही कब्जा बना रहेगा। प्रशासको की नियुक्ति के बारे में भले ही एक्ट में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है लेकिन प्रशासक का मतलब कम से कम इतना तो जरूर होता है कि वह किसी भी पार्टी का नहीं होता है। सरकार के इस फैसले का विरोध विपक्षी दल कांग्रेस द्वारा तो किया ही जा रहा है इसके साथ ही यह भी खास बात है की इसे लेकर अन्य जनप्रतिनिधियों में भी रोष है। उनका भी यही कहना है कि ऐसा करके सरकार ने उनकी उपेक्षा की है। राज्य में 85 ब्लाक प्रमुख और 65 हजार से अधिक जनप्रतिनिधि अब स्वयं को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। लोगों का मानना यह भी है कि भाजपा सरकार के इस फैसले का उसे आने वाली पंचायत चुनाव में भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। उधर विपक्ष के नेता अब सरकार के इस फैसले को लेकर नियम कानून की किताबें भी देख रहे हैं कि क्या यह फैसला संवैधानिक है तथा किन बिंदुओं के आधार पर वह सरकार के फैसले को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते है अगर यह मामला न्यायालय तक पहुंचता है तो सरकार इसका नुकसान होना भी तय है। दरअसल आप सत्ता में बैठकर संवैधानिक मामलों में अपनी सुविधा और लाभ के अनुसार फैसले लेने के लिए स्वतंत्र नहीं हो सकते हैं। उत्तराखंड राज्य ने अपने यह जो नया प्रयोग प्रशासकों की नियुक्ति को लेकर किया है इसकी क्या परिणीति होगी यह आने वाला समय ही बताएगा।




