Home उत्तराखंड देहरादून अभिशाप से मुक्ति जरूरी

अभिशाप से मुक्ति जरूरी

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अच्छी बात है कि बीते दिनों हुए कुछ बड़े सड़क हादसों के बाद राजधानी की पुलिस सतर्क और सजक दिखाई दे रही है। सड़क पर शराब पीने वालों और नशा करके वाहन चलाने वालों की न सिर्फ जांच की जा रही है अपितु उनकी गिरफ्तारी तथा वाहनों के चालान तथा वाहन सीज किये जा रहे हैं। यूं तो पूरे राज्य की नशे के मामले में कमोबेश एक जैसी स्थिति ही है लेकिन देहरादून का हाल कुछ ज्यादा ही खराब है। यहां ऐसे नशेड़ियों की भी कमी नहीं है जो सुबह से ही ठेकों की शरण में पहुंच जाते हैं। शाम के बाद तो हालात के कहने ही क्या? हर सड़क, गली, मोहल्ले से लेकर बार और रेस्टोरेंटों में इन नशेड़ियों की भरमार देखी जा सकती है जैसे—जैसे रात का अंधेरा बढ़ता जाता है वैसे—वैसे इनकी संख्या और हुड़दंग भी जोर पकड़ता जाता है। खास बात यह है कि न तो खुले आम पीने वालों में और न पिलाने वालों में पुलिस का कोई खौफ होता है और न किसी तरह का कोई लिहाज। हालात ऐसे हो जाते हैं कि जो कामकाजी लोग तथा महिलाएं 9—10 बजे के बाद सड़कों पर निकलते हैं तो उन्हें आए दिन इन नशेड़ियों की ऊलजुलल हरकतों का सामना करना पड़ता है। सड़कों पर वाहन चालकों की हालत भी ऐसी होती है कि कुछ विरले ही बिना पिए मिलेंगे। तमाम तरह के ऐसे नशे भी इनके द्वारा किए जाते हैं जिन्हें जांच में भी पकड़ पाना संभव नहीं होता है। स्थिति इतनी विस्फोटक हो चुकी है कि आम आदमी भी सड़कों पर चाहे कितनी सतर्कता और सावधानी क्यों न बरते? इस बात की कोई गारंटी नहीं कि कब कौन किसे ठोक दे। एक बात बड़ी साफ है कि जब तक सड़कों पर शराब पीना और पीकर वाहन चलाने का यह है सिलसिला रोका नहीं जाएगा तब तक न सड़क हादसों को रोका जा सकता है और न ही नशाजन्य अपराधों को। बीते 3 दिन में पुलिस ने 156 नशेड़ियों को गिरफ्तार किया तथा उनके वाहन सीज किये गए। सही मायने में यह संख्या बहुत कम है अगर पुलिस दून में एक दिन भी सघन जांच करें तो हजारों की संख्या में लोग पकड़े जाएंगे। मुख्यमंत्री धामी 2025 के अंत तक राज्य को नशा मुक्त बनाने की बात करते हैं। उनकी इस बात में कोई दम नहीं है। राज्य में नशा व नशा तस्करों का एक मजबूत नेटवर्क राज्य बनने के बाद से ही कायम है उसे शासन—प्रशासन न आसानी से ध्वस्त कर सकता है। भले ही इस नशे की गिरफ्त में आकर हमारी भावी पीढ़ियां बर्बादी की कगार पर पहुंच चुकी है। स्कूल—कॉलेजों से लेकर छात्रावासों तक नशे की सप्लाई हो रही है। 24 घंटे नशे की उपलब्धता है सिर्फ जेब में पैसा होना चाहिए। किसी के भी मरने जीने या बर्बाद होने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है। अगर पड़ता होता तो राज्य और राजधानी दून में हर किलोमीटर की दूरी पर एक शराब की दुकान नहीं खोली गई होती। लोग पीकर सड़क दुर्घटनाओं में मरे या फिर जहरीली शराब व ड्रग्स की ओवरडोज लेकर, लोग मर रहे हैं और यूं ही मरते रहेंगे। नशे से अपराध बढ़ रहा है और बढ़ते रहेंगे। लोगों के घर तबाह हो रहे हैं पूरे समाज में अराजकता फैल रही है। सवाल यह है कि सिर्फ किसी हादसे के बाद हरकत में आने वाले प्रशासन द्वारा इस पर शिकंजा कैसे कसा जा सकता है।

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