उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों जिस तरह की उठा पटक चल रही है उसके क्या नतीजा सामने आएंगे भले ही इसके बारे में अभी कहना जल्दबाजी होगा लेकिन सचिवालय में बॉबी पवार और मीनाक्षी सुंदरम के बीच हुआ टकराव अब सरकार और भाजपा के लिए तो एक नई मुसीबत बन ही चुका है साथ ही सीएम धामी के लिए बड़ी सरदर्दी बन चुका है। राज्य के भ्रष्टाचार और अधिकारियों के खिलाफ बॉबी पवार का आंदोलन अब एक कदम और आगे जाकर मुख्यमंत्री धामी तक पहुंच गया है। जो अब केदारनाथ चुनाव हराने और मुख्यमंत्री धामी को हराने की खुली चुनौती दे रहे हैं। खास बात यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और कांग्रेस के नेता भी उनके सुर में सुर मिला रहे हैं। भले ही बात नई न हो लेकिन उत्तराखंड में मुख्यमंत्री बदलने की यह चर्चा आम हो चुकी है। दरअसल इसकी शुरुआत कुछ ही महीने पहले पूर्व सीएम तीरथ सिंह रावत द्वारा पार्टी के ही एक कार्यक्रम में अपने संबोधन में बोलते हुए कहा था कि जो आज मंच पर आगे बैठे हैं वह कल पीछे बैठे होंगे और जो पीछे बैठे हैं वह आगे। भाजपा को कार्यकर्ताओं की पार्टी बताते हुए उन्होंने नेताओं को लताड़ा था कि कोई भी कार्यकर्ता छोटा नहीं होता है और सभी का सम्मान जरूरी है। इसके बाद इस मुद्दे को थोड़ी सी हवा भाजपा के मंगलौर और बद्रीनाथ सीट के उपचुनाव में हार से भी मिली। जिसे अब केदारनाथ उपचुनाव की जीत हार से जोड़ दिया गया है। बात एकदम साफ है कि अगर सत्ता में रहते हुए भाजपा केदारनाथ का उपचुनाव भी अगर हारती है तो इस लगातार तीसरी हार को पचा पाना न तो प्रदेश भाजपा के नेताओं को गंवारा होगा और न केंद्रीय नेताओं को। तथा इससे प्रभावित हुए बिना न तो सरकार रह सकेगी और न संगठन और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी। अब सचिवालय विवाद इस अध्याय में एक और नई कड़ी बनकर जुड़ चुका है। मुख्यमंत्री धामी को अपने अधिकारियों को भी साधना है और विपक्षी नेताओं के हमलो का भी जवाब एक साथ देना है। भले ही यह दिखने में आसान लग रहा हो लेकिन कितना कठिन है इस बात को बॉबी पंवार की गिरफ्तारी से ही लगाया जा सकता है। उधर मूल निवास और भू कानून के मुद्दे को लेकर पहले ही प्रदेश में विरोध की चिंगारी धधक रही है। मुख्यमंत्री के बयानों पर लोग भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। मुख्यमंत्री धामी जो यूसीसी लागू करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ते दिख रहे हैं अब उसका भी कहीं कोई जिक्र नहीं हो रहा है। केदारनाथ चुनाव पर अब सारा दारोमदार आकर टिक गया है। 3 नवंबर को केदारनाथ के क्या चुनावी नतीजे आते हैं वह प्रदेश की भावी राजनीति की दिशा व दशा को तय करने वाले होंगे। भाजपा सरकार और सीएम धामी इसके बाद किस स्थिति में होंगे यह चुनावी नतीजे ही बताएंगे। फिलहाल भाजपा थोड़ी मुश्किलों में जरूर दिख रही है लेकिन इस मुश्किल का हल भी केदारनाथ जीत ही हो सकता है और कुछ नहीं।



