Home उत्तराखंड देहरादून नफरत की आग में झुलस्ता पहाड़

नफरत की आग में झुलस्ता पहाड़

0
271


उत्तराखंड की शांत वादियाें में जिस तरह की आग बीते कुछ समय से सुलग रही थी वह धीरे—धीरे शोलो में तब्दील होना शुरू हो गई है। बीते कल उत्तरकाशी के भटवाड़ी में एक धार्मिक स्थल को हटाने की मांग को लेकर हिंदू संगठनों और सनातन धर्म के संरक्षकों ने बवाल किया और वह पुलिस से ही भिड़ गए इस तरह संघर्ष की शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। पुलिस पर किए गए पथराव और फिर पुलिस द्वारा किए गए लाठी चार्ज की घटना में कुछ पुलिसकर्मियों सहित 29 लोगों के घायल होने की खबर है जिसमें से एक पुलिसकर्मी व एक बच्चे को इतनी गंभीर चोटें आई है कि उन्हें दूंन रेफर करना पड़ा है। इस घटना की खास बात यह है कि इस संघर्ष में तीसरा पक्ष जिसके एक धार्मिक स्थल को हटाने की मांग को लेकर यह रैली की गई वह कहीं भी शामिल नहीं था। एक खास बात यह भी है कि जिस धार्मिक स्थल को हटाने तथा बाहरी लोगों को यहां से भगाने की मांग की जा रही है उस धार्मिक स्थल को पहले ही प्रशासन द्वारा वैध बताया जा चुका है। बीते कुछ समय से राज्य में पहाड़ी और बाहरी का मुद्दा गर्माता जा रहा है। तथा महिलाओं से छेड़छाड़ और अवैध कब्जों को इस विवाद का आधार माना जा रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी राज्य के डेमोग्राफिक चेंज की बात कहकर समय—समय पर राज्य की मूल संस्कृति के संरक्षण का दावा करते हैं। राज्य में धार्मिक संरचनाओं की आड़ में किए गए अवैध कब्जों को हटाने के लिए बुलडोजर अभियान चलाया जा रहा है तथा बाहरी लोग जो अवैध रूप से राज्य में रह रहे हैं उनकी पहचान करने के लिए सभी जिलों में वेरीफिकेशन ड्राइव भी चल रहा है। यह दोनों ही काम संवैधानिक दृष्टिकोण से अनुचित नहीं कहे जा सकते हैं। अवैध रूप से जमीनों पर जो भी कब्जे किए गए हैं चाहे वह वन भूमि पर हो या फिर सरकारी भूमि पर शासन को उन सभी जमीनों को कब्जा मुक्त कराना चाहिए तथा जो लोग अन्य राज्यों के हैं और अवैध रूप से रह रहे हैं उनका इतिहास—भूगोल क्या है? तथा उनके यहां रहने का उद्देश्य क्या है यह जानने का भी शासन—प्रशासन को अधिकार है। लेकिन इन मुद्दों का राजनीतिक इस्तेमाल नहीं होना चाहिए इसका भी शासन—प्रशासन को ही ध्यान रखना चाहिए। अगर किसी अन्य राज्य का या अन्य समुदाय का व्यक्ति संवैधानिक अधिकार और कानूनी तरीके से राज्य में रह रहा है तो उसे सिर्फ यह मानकर की कि वह बाहरी है उसके खिलाफ किसी भी तरह की दुर्भावनापूर्ण कार्यवाही नहीं की जानी चाहिए। लेकिन बीते कुछ सालों में राज्य में इस तरह का दुष्प्रचार किया जा रहा है कि राज्य में जो कुछ भी गलत हो रहा है वह सब बाहरी लोगों के कारण ही हो रहा है। राज्य में सामाजिक विभाजन और अलगाव की भावना को ही हवा मिल रही है। जिसकी परिणीति यह है कि जिसे पुलिस प्रशासन सही बता रहा है उसे भी आम जनता गलत मान रही है और वह अब पुलिस प्रशासन से भी मरने—मारने पर उतारू हो चुकी है। नफरत की इस आग के दूरगामी नतीजे अत्यंत ही खतरनाक हो सकते हैं। उत्तराखंड के लोग भी देश के तमाम राज्यों में रहते हैं अगर राज्य के लोग ऐसा कुछ करेंगे तो यह आग अन्य राज्यों तक फैल जाएगी इसलिए इसे तत्काल प्रभाव से रोकने की जरूरत है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here