मलिन बस्तियों की समस्या किसी एक प्रदेश या शहर की नहीं है। हर एक शहर में नदी नालों और खालों तथा जंगलों में इन मलिन बस्तियों का संसार पसरा हुआ आपको देखने को मिलेगा। झुग्गी—झोपड़ियां से लेकर कच्चे—पक्के और टाट—पटृी तथा तिरपाल वाली इन बस्तियों को देखकर कोई भी सोच सकता है कि आखिर यह कौन लोग हैं कहां से आ जाते हैं और क्यों कई—कई बार इन्हें हटाये जाने के बाद भी यह मलिन बस्तियां कभी खत्म ही नहीं होती है। दरअसल इन मलिन बस्तियों के पीछे भी एक सामाजिक और राजनीतिक विज्ञान छिपा हुआ है। जब तक इस देश में गरीब और गरीबी रहेगी तब तक मलिन बस्तियां भी रहेगी और जब तक इन मलिन बस्तियों के पास वोट का संवैधानिक अधिकार रहेगा जिसे कोई छीन नहीं सकता तब तक मलिन बस्तियों का अस्तित्व भी सुरक्षित रहेगा उसे कोई मिटा नहीं सकता है। इसलिए यह जो मलिन बस्तियों की समस्या है वह एक अनंत समस्या है जिसका कोई स्थाई समाधान संभव ही नहीं है। वर्ष 2016 में हाईकोर्ट द्वारा उत्तराखंड सरकार को इन मलिन बस्तियों को हटाने का आदेश दिया गया था प्रशासन भी इस आदेश के बाद बुलडोजर लेकर सड़कों पर आ गया और तोड़फोड़ शुरू हो गई। ऐसी ताबड़तोड़ कार्रवाई शुरू हुई कि एक बारगी तो ऐसा लगा कि चाहे सारा दून शहर खंडहर में तब्दील हो जाए लेकिन न अवैध यह मलिन बस्तियां रहेगी न अतिक्रमण का नामोनिशान बचेगा लेकिन जब जनप्रतिनिधि इन बुलडोजरों के सामने खड़े हो गए तो इसके पहिए भी थम गए और फिर इसके बाद से आज तक स्थिति यथावत ही बनी हुई है। तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपने कार्यकाल में इन मलिन बस्तियों के नियमितिकरण के लिए नियमावली तैयार की थी लेकिन उनकी सत्ता जब डांवाडोल हो गई तो यह मामला भी ठंडे बस्ते में चला गया। इसके बाद जब भी चुनाव आते हैं तो इन मलिन बस्तियों के नियमितिकरण का सवाल भी जोर पकड़ने लगता है। अकेले राजधानी दून में 150 के आसपास मलिन बस्तियां हैं तथा पूरे राज्य में 590 के आसपास मलिन बस्तियां हैं। जिनमें 8 लाख से भी अधिक वोट रहते हैं। जिनका वोट किसी भी चुनाव में हर एक राजनीतिक दल के लिए महत्वपूर्ण होता है अब राज्य में निकाय चुनाव होने वाले हैं ऐसी स्थिति में सरकार जहां एक बार और फिर 2018 व 2021 की तरह से तीसरी बार नया अध्यादेश लाकर इन मलिन बस्तियों को बचाने की मुहिम में जुटी हुई है वहीं कांग्रेस का कहना है कि सरकार इन मलिन बस्तियों के नियमितीकरण को टालना चाहती है और इसका कोई स्थाई समाधान निकालना ही नहीं चाहती है। लेकिन सवाल यह भी है कि आखिर सरकार अध्यादेश और फिर अध्यादेश लाकर कब तक इन मलिन बस्तियों को बचा सकती है और हाईकोर्ट कब तक सरकार के इस प्रयास को सफल होता देखता रहेगा। एक बात जरूर साफ है कि सरकार इस समस्या के समाधान को लेकर उदासीन जरूर बनी हुई है। सरकार को इस समस्या के समाधान पर आगे बढ़ने की जरूरत है। जबकि इन बस्तियों में रहने वाले हमेशा ही भय में रहने पर मजबूर है कि कब उनका आशियाना उनसे छीन लिया जाएगा।



