- 50 हजार का जुर्माना भी जनता की जेब से निकलेगा
देहरादून। जिलाधिकारी के छापों के बाद भी शराब के ठेकों पर ओवर रेटिंग पर लगाम नहीं लग सकी है। दुकान पर ठोका गया पचास हजार रूपये का जुर्माना भी जनता की जेब से निकाला गया। यह क्या माजरा है इसकी जांच तो जिलाधिकारी को करनी पडेगी।
जिलाधिकारी सविन बसंल को पदभार सम्भालने के कुछ दिनों बाद ही शिकायत मिली कि शहर की शराब की दुकानों पर ओवर रेटिंग हो रही है। शराब की बोतल में छपे एमआरपी से ज्यादा पैसे वसूले जा रहे हैं और सेल्समैन से इसके बारे में पूछने पर ग्राहकों के साथ बदसलूकी से लेकर मारपीट तक की जाती है। इस शिकायत के बाद जिलाधिकारी ने ग्राहक बनकर शराब के ठेकों पर छापा मारा तो वहां पर उन्होंने ओवर रेटिंग पकड ली। लेकिन सेल्समैन ने उनके साथ भी बदसलूकी कर डाली। जिसके बाद जब जिलाधिकारी का लाव लश्कर मौके पर पहुंचा तो पता चला कि यह जनपद के नये जिलाधिकारी है। जिसके बाद जिलाधिकारी ने शराब केे ठेके पर पचास हजार रूपये का जुर्माना ठोक दिया। जिलाधिकारी के इस कदम से लोगों ने राहत की सांस ली कि अब ठेकों पर ओवर रेटिंग नहीं होगी। लेकिन यह क्या जिलाधिकारी के छापे के दूसरे दिन से ही ओवर रेटिंग का खेल फिर से शुरू हो गया। प्रत्येक ब्रांड पर शराब के ठेके के सेल्समैन दस से बीस रूपये तक की ओवर रेटिंग लेते हैं। यह बात ठेके के मालिक के संज्ञान में भी होती है लेेकिन वह भी सेल्सम्ौनों के सामने नतमस्तक होता है। जबकि इन्हीं शराब के ठेकों से सुबह पांच बजे पैगारी की जाती है और पैगारी की गयी वही शराब गली मौहल्लों में ठेको से दस रूपये सस्ती उपलब्ध होती है। यह सोचने वाली बात है कि ठेकों में दस से बीस रूपयेे अधिक वसूले जाते हैं और इन्हीं ठेकों से निकली शराब गली मौहल्लों में सस्ते दामों में उपलब्ध हो जाती है। जिलाधिकारी सविन बसंल ने जब इन ठेकों पर छापे मारे तो जुर्माने के अलावा कोई ठोस कार्यवाही नहीं की। जुर्माना कौन सा इन ठेका संचालकों की जेब से जमा होना है। वह तो शाम तक ओवर रेटिग कर जुर्माने से अधिक धनराशि जनता से वसूल कर सरकारी खजाने में जमा करा देंगे। लेकिन इसकी मार तो फिर आम जनता पर ही पड रही है। अब सोचने वाली बात यह है कि जिलाधिकारी ने ठेकों पर छापे आम जनता को राहत पहुुंचाने के लिए मारे या फिर जनता का उत्पीडन करने के लिए यह अपने आप में सोचने वाली बात है। क्योंकि हर हाल में उत्पीडन तो आम जनता का ही हो रहा है। जिलाधिकारी ने अगर जुर्माने की जगह कोई ठोस कार्यवाही की होती तो शायद कुछ हद तक ओवर रेटिंग पर लगाम लग सकती थी वह भी फौरी तौर पर, पूूरी तरह ओवर रेटिंग कोई रोक दे ऐसा नहीं हो सकता। यह ओवर रेटिंग तो कम्पनी भी रोक नहीं पायी थी जबकि कम्पनी के समय में तो ओवर रेटिंग की शिकायत पर कम्पनी के कारिंदे ठेके पर पहुंच सेल्समैन को अपने आफिस में ले जाकर बूरी तरह से मारते पीटते थे लेकिन उनकी दबंगाई भी इस ओवर रेटिंग के खेल को नहीं रोक पायी थी तो मात्र पचास हजार रूपये के जुर्माने से यह कैसे रूक सकेगी जबकि वह जुर्माना भी जनता की जेब से निकलना है। इस बारे में अब प्रशासन को कोई ठोस नीति अपनानी होगी तभी इस खेल पर लगाम लग सकेगी।




