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अवैध बस्तियों पर फिर संकट के बादल

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  • अक्टूबर में समाप्त हो रही है अध्यादेश की अवधि
  • सरकार ने 6 सालों में नहीं तलाशा कोई स्थाई समाधान

देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी में बसी अनियमित बस्तियाें के नियमितीकरण पर सरकार बीते 6 सालों में भी कोई हल नहीं ढूंढ पाई है। जिसके कारण एक बार फिर इन बस्तियों के सर पर उन्हें उजाड़े जाने का खतरा मंडराता दिख रहा है।
उल्लेखनीय है कि 2018 में हाई कोर्ट द्वारा जब अतिक्रमण हटाने को लेकर आदेश जारी किया गया था तब नदी—नालों, खालो और जंगलात तथा सरकारी जमीनों पर बसी इन अवैध बस्तियों को हटाने के निर्देश दिए गये थे। शासन—प्रशासन द्वारा इस पर व्यापक स्तर पर कार्यवाही भी शुरू की गई थी लेकिन यह अतिक्रमण हटाओ अभियान दून के प्रमुख बाजारों और सड़कों तक ही चलाया जा सका था। जब इन अवैध बस्तियों में चिन्हीकरण का काम शुरू हुआ और लाल निशान लगाये जाना शुरू हुए तो इसका जन विरोध भी उग्र रूप लेने लगा। खास बात यह थी कि सत्ताधारी दल के विधायक और जनप्रतिनिधि ही आकर बुलडोजर के सामने खड़े हो गए और सरकार को इस अतिक्रमण हटाओ अभियान को वापस लेना पड़ा था।
तब सरकार द्वारा एक अध्यादेश लाकर इन बस्तियों को टूटने से या उजड़ने से बचा लिया गया था। सरकार द्वारा अपने शपथ पत्र में अदालत से कहा गया था कि वह पीएम आवास योजना या अन्य सरकार की आवासीय योजनाओं के तहत इन बस्तियों में रहने वालों को आवास उपलब्ध कराएगी। जिससे इन बस्तियों में रहने वालों को विस्थापित किया जा सकेगा और वह बेघर होने से बच जाएंगे। सरकार द्वारा लाये गए इस अध्यादेश की अवधि अब 21 अक्टूबर को समाप्त होने वाली है। सरकार ने जब इतने वर्षों में कुछ नहीं किया है तो अब कुछ ही दिन में इसका सही समाधान तो संभव नहीं है। या तो सरकार इस अध्यादेश की अवधि को बढ़ाने का प्रयास करेगी या फिर इन बस्तियों में रहने वालों को मालिकाना हक देने का प्रस्ताव कैबिनेट में लाकर इस कानूनी अधिकार को अमली जामा पहनाएगी जो मुश्किल लगता है।
राजधानी दून में जो चिन्हित बस्तियां हैं उनकी संख्या 133 है। इन 133 बस्तियों में बड़ी संख्या में लोग रहते हैं जो दशकों से रह रहे हैं तथा बिजली पानी का बिल भी भर रहे हैं। इन बस्तियों में जो वोटर संख्या है जिनकी तादाद लाखों में है। इस वोट बैंक को नाराज करना भी आसान नहीं है। देखना यह है कि अब सरकार इन मलिन बस्तियों को बचाने के लिए क्या कदम उठाती है

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