September 3, 2026रामलीला मैदान के शुद्धिकरण पर हाईकोर्ट की चौखट पर डा. बैजनाथ, सात सितंबर को होगी सुनवाई डा.बैजनाथ ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की सभा के बाद शुद्धिकरण को दी हाईकोर्ट में चुनौती स्वतंत्र जांच से लेकर साक्ष्य सुरक्षित रखने की मांग, पुलिस की भूमिका भी आ गई है सवालों के घेरे में सत्ता के नशे में चूर नेताओं की शह, खाकी की संदिग्ध खामोशी और प्रशासनिक लीपापोती का भांडाफोड़ जनहित याचिका ने पूरी व्यवस्था की धज्जियां उड़ा दी, कुर्सी बचाने में जुट गए हैं सूबे के आला अफसर देहरादून। हल्द्वानी के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में शुद्धिकरण और हवन-यज्ञ के नाम पर परोसे गए नफरती खेल की आंच अब सीधे उत्तराखंड हाईकोर्ट के दरवाजे तक जा पहुंची है। सत्ता के नशे में चूर नेताओं की शह, खाकी की संदिग्ध खामोशी और प्रशासनिक लीपापोती का भांडाफोड़ करते हुए जनहित याचिका ने पूरी व्यवस्था की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। सात सितंबर को होने जा रही सुनवाई से पहले शासन-प्रशासन के शीर्ष आकाओं की नींद उड़ चुकी है और पूरे महकमे में हड़कंप मचा हुआ है।बता दें कि हल्द्वानी के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की जनसभा के बाद कथित तौर पर कराए गए शुद्धिकरण यज्ञ/हवन का विवाद अब उत्तराखंड हाईकोर्ट पहुंच गया है। मामले में डा. बैजनाथ ने जनहित याचिका दायर कर पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग की है। याचिका पर 7 सितंबर को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में सुनवाई प्रस्तावित है। ई-कोर्ट रिकार्ड के अनुसार मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति जस्टिस सुभाष उपाध्याय की डिवीजन बेंच के समक्ष सूचीबद्ध है। डा. बैजनाथ की ओर से अधिवक्ता रक्षित जोशी पैरवी कर रहे हैं।याचिका में अदालत से मांग की गई है कि खड़गे की सभा के बाद रामलीला मैदान में हुए कथित शुद्धिकरण यज्ञ/हवन की जांच स्थानीय थाने से जुड़े पुलिसकर्मियों के बजाय किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी या ऐसी स्वतंत्र टीम से कराई जाए, जिसका स्थानीय पुलिस स्टेशन से संबंध न हो। यानी याचिका ने सीधे उस सवाल को अदालत के सामने ला खड़ा किया है कि आखिर सार्वजनिक राजनीतिक कार्यक्रम के बाद शुद्धिकरण कराने की जरूरत क्यों पड़ी और इस पूरी कवायद के पीछे वास्तविक मंशा क्या थी?मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि याचिका में जांच के दौरान यदि कानूनन अपराध के तत्व सामने आते हैं तो संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनों के तहत कार्रवाई की मांग की गई है। डा. बैजनाथ की याचिका में अदालत से घटनाक्रम से जुड़े तमाम साक्ष्यों को तत्काल सुरक्षित रखने का निर्देश देने की भी मांग की गई है। इसमें सीसीटीवी फुटेज, वीडियो रिकार्डिंग, फोटो, इलेक्ट्रानिक संचार, सोशल मीडिया सामग्री, पुलिस रिकार्ड, शिकायतें, रिपोर्ट, अनुमति संबंधी दस्तावेज और अन्य इलेक्ट्रानिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य शामिल हैं।यह मांग मामले को महज राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे ले जाती है। अब सवाल यह भी है कि घटना के समय क्या रिकार्ड हुआ, किसने क्या किया, प्रशासन और पुलिस को क्या जानकारी थी और बाद में पूरे घटनाक्रम पर क्या कार्रवाई हुई। याचिका में राज्य सरकार के साथ जिलाधिकारी, नैनीताल, एसएसपी नैनीताल, पुलिस महानिदेशक और संबंधित थाना प्रभारी को भी प्रतिवादी बनाया गया है। इससे साफ है कि याचिकाकर्ता केवल घटना की जांच नहीं, बल्कि प्रशासन और पुलिस की भूमिका की भी न्यायिक निगरानी में पड़ताल चाहता है।याचिका का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पक्ष यह है कि राज्य सरकार को उत्तराखंड में छुआछूत के संवैधानिक निषेध को प्रभावी ढंग से लागू करने के निर्देश देने की मांग की गई है। इसके साथ ही राज्य के दायित्वों के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग भी अदालत से की गई है। यानी हल्द्वानी का यह विवाद अब केवल किसने हवन कराया और क्यों कराया तक सीमित नहीं है। याचिका ने इसे समानता, सामाजिक सम्मान और छुआछूत के खिलाफ संवैधानिक व्यवस्था के सवाल से जोड़ दिया है।रामलीला मैदान में सामाजिक सौहार्द को तार-तार करने वाले इस विवादित घटनाक्रम पर अब तक पुलिस-प्रशासन मूकदर्शक बना तमाशा देख रहा था। नेताओं की चौखट पर नतमस्तक पुलिस जिस मामले में एफआईआर तक दर्ज करने से कतरा रही थी, उसी मामले को डा. बैजनाथ की याचिका ने सीधे हाईकोर्ट की चौखट पर खींच लिया है। याचिका ने साफ कर दिया है कि हल्द्वानी में कानून-व्यवस्था का जनाजा ऐसे ही नहीं निकला, बल्कि इसके पीछे नीचे से लेकर ऊपर तक प्रशासनिक नाकामी का पूरा तंत्र शामिल था। याचिका का प्रहार इतना सटीक और मारक है कि इसमें किसी छोटे कर्मचारी को बलि का बकरा बनाने की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी गई है। सत्ता और पुलिस प्रशासन के पांच सबसे बड़े आकाओं को एक साथ कटघरे में खड़ा कर दिया गया है। सात सितंबर को हाईकोर्ट की बेंच ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए आला अफसरों से हलफनामा मांगा है। इससे कई बड़े अधिकारियों का नपना तय माना जा रहा है।बता दें कि रामलीला मैदान विवाद में अब तक पर्दे के पीछे बैठकर तमाशा देखने वाले अफसरों के पास अब भागने का कोई रास्ता नहीं बचा है। पूरे उत्तराखंड की निगाहें अब 7 सितंबर को होने वाले न्यायिक प्रहार पर टिकी हैं। कि क्या हाईकोर्ट राज्य सरकार और पुलिस के शीर्ष आकाओं को समन भेजकर निजी रूप से तलब करेगा? क्या सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वालों और उन्हें संरक्षण देने वाले अफसरों पर सख्त कार्रवाई का चाबुक चलेगा? हल्द्वानी के रामलीला मैदान से उठा यह बवंडर अब प्रशासनिक दफ्तरों को उखाड़ फेंकने के लिए हाईकोर्ट पहुंच चुका है। 7 सितंबर को यह तय हो जाएगा कि कानून का राज चलेगा या फिर खाकी और खादी की जुगलबंदी यूं ही कानून की धज्जियां उड़ाती रहेगी।