चारधाम यात्रा पर तकरार

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कोरोना काल में जान और जहान बचाने की जद्दोजहद का ही परिणाम है कि कोर्ट और राज्य सरकारों के बीच अब अदावत की रेखाएं खिचंने लगी है। इसका ताजा उदाहरण है चारधाम यात्रा। जिसे लेकर उत्तराखंड सरकार और नैनीताल हाईकोर्ट अब आमने—सामने हैं। सरकार किसी भी कीमत पर इस चारधाम यात्रा को 1 जुलाई से शुरू करने की जिद पर अड़ी हुई है वहीं कोर्ट सरकार को बिना पुख्ता इंतजामों के यात्रा शुरू न करने देने पर अडिग दिखाई दे रही है। हाई कोर्ट द्वारा पहले इस यात्रा को स्थगित करने के निर्देश दिए गए थे लेकिन यात्रा शुरू करने की जिद पर अड़ी सरकार ने कोर्ट के निर्देशों को अनदेखा करते हुए कैबिनेट बैठक में यात्रा को 1 जुलाई से ही शुरू करने के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए इसके लिए एसओपी भी जारी कर दी गई। कोर्ट द्वारा बीते कल इस बाबत दिए गए शपथ पत्र पर असंतुष्टि जताते हुए जब यात्रा पर रोक लगाने का आदेश दे दिया गया तो अब सरकार इस आदेश को न मानने और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कह रही है। निश्चित रूप से सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव की इस स्थिति को ठीक नहीं समझा जा सकता है। हाई कोर्ट के वर्तमान निर्णय को अगर पिछले अनुभव के आधार पर देखा जाए तो यह गलत नहीं है महाकुंभ के दौरान जिस तरह से ेएसओपी की धज्जियां उड़ाई गई और फर्जी कोरोना जांच की गई उसका परिणाम प्रदेश और देश दोनों को ही भोगना पड़ा। महाकुंभ की लापरवाही से भारी जानमाल का नुकसान हुआ इसे हम सभी जानते हैं। आज अगर कोर्ट सरकार के शपथ पत्र पर भरोसा नहीं कर पा रहा है तो इसका कारण भी सरकार ही है। किसी भी मुद्दे से सरकार यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकती है कि भीड़ से कानून का पालन कराना संभव नहीं हो सकता है अगर यह सच है तो कम से कम भीड़ का जमाना होने देने से रोका जा सकता है। कोर्ट का सवाल भी यही है कि आप पहले कानून का अनुपालन सुनिश्चित करें फिर यात्रा शुरू करें। सुप्रीम कोर्ट जाने की बजाय अगर सरकार हाईकोर्ट को अपनी सुरक्षा इंतजामों से संतुष्ट करने की कोशिश करती तो ज्यादा बेहतर होता। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जैसे—जैसे कोरोना कर्फ्यू में ढील दी जा रही है बाजारों और सड़कों पर उमड़ती भारी भीड़ फिर से बड़े खतरे को आमंत्रण दे रही है। इस भीड़ को नियंत्रित करना या उससे एस ओ पी का अनुपालन कराया जाना असंभव दिख रहा है। वही दो दौर की तमाम मुश्किलों से दो—चार होने पर आम जनता उससे कोई सबक लेने को तैयार नहीं है अगर हाल यही रहता है तो तीसरी लहर को जल्द आने और उससे होने वाले बड़े नुकसान को कोई नहीं रोक पाएगा। जान और जान बचाने की इस जद्दोजहद में सरकार और कोर्ट दोनों की अहम भूमिका जरूरी है यह समय तकरार का नहीं भविष्य की चुनौतियों से निपटने की तैयारियों का है क्योंकि खतरा अभी भी टला नहीं है।

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