August 11, 2026टौंस और यमुना चेतावनी स्तर के करीब उत्तरकाशी। उत्तरकाशी में बीती रात से आज सुबह तक कई क्षेत्रों में बारिश का दौर जारी रहा। जिला आपातकालीन परिचालन केंद्र की ओर से आज सुबह 8 बजे जारी रिपोर्ट के अनुसार जिला मुख्यालय में सर्वाधिक 53 मिमी बारिश दर्ज की गई। इसके अलावा मोरी में 42 मिमी, बड़कोट में 26 मिमी, भटवाड़ी में 23 मिमी, चिन्यालीसौड़ और पुरोला में 20—20 मिमी तथा डुण्डा में 10 मिमी वर्षा रिकॉर्ड की गई।बारिश के बीच जिले की प्रमुख नदियों के जलस्तर पर भी प्रशासन की नजर बनी हुई है। सुबह 8 बजे के आंकड़ों के अनुसार टौंस नदी मोरी में 1266.71 मीटर पर बह रही थी, जबकि इसका चेतावनी स्तर 1267 मीटर है। यानी नदी चेतावनी स्तर से महज 0.29 मीटर नीचे है। इसी तरह यमुना नदी नौगांव में 1058.95 मीटर दर्ज की गई, जो 1059 मीटर के चेतावनी स्तर से महज 0.05 मीटर नीचे है। कुथनौर में यमुना का जलस्तर 1427.32 मीटर दर्ज हुआ। भागीरथी नदी का जलस्तर तिलोथ पुल पर 1120.80 मीटर रहा, जबकि चेतावनी स्तर 1122 मीटर है। हर्षिल में भागीरथी 2492.71 मीटर पर दर्ज की गई। पुरोला में कमल नदी का जलस्तर 1196.90 मीटर रहा।बारिश के कारण यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर पालीगाड, सिलाई बैंड, दुर्बिल और बनास के पास मलबा एवं पत्थर आने से यातायात बाधित है। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की टीम द्वारा मार्ग खोलने की कार्रवाई की जा रही है। वहीं गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर यातायात सुचारू बताया गया है। फिलहाल जनपद में किसी बड़े नुकसान की सूचना नहीं है और स्थिति सामान्य है।
August 11, 2026देहराूदन। कोतवाली विकासनगर क्षेत्र में एक युवती ने लोक गायक डब्ल्यू आर्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया है। युवती ने आरोप लगाया है कि लोक गायक ने उसे बदनाम करने के उद्देश्य से उसके नाम से गीत बनाए और मानसिक रूप से परेशान करने के साथ धमकी भी दी।पुलिस के अनुसार, युवती ने तहरीर में आरोप लगाया कि 3 अप्रैल को जौनसार क्षेत्र के एक लोक गायक के खिलाफ दुष्कर्म और धमकी देने के आरोप में कालसी कोतवाली में मुकदमा दर्ज कराया गया था। इसके बाद लोक गायक ने गिरफ्तारी से बचने के लिए हाईकोर्ट की शरण ली थी। युवती के अनुसार, हाईकोर्ट ने लोक गायक को इंटरनेट मीडिया पर इस मामले से संबंधित किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं करने का आदेश दिया था। आरोप है कि इसके बावजूद लोक गायक ने युवती और उसके परिवार को मानसिक रूप से परेशान करना शुरू कर दिया। युवती ने आरोप लगाया कि उस पर मुकदमा वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है। साथ ही उसे बदनाम करने के लिए जौनसारी गीत तैयार किए गए हैं। आरोप है कि इन गीतों के माध्यम से युवती को निशाना बनाया जा रहा है। तहरीर में यह भी आरोप लगाया गया है कि लोक गायक अश्लील गीतों को युवती के पिता और रिश्तेदारों को व्हाट्सऐप के माध्यम से भेजता रहा। 24 जुलाई को भी पीड़िता के पिता को धमकी भरा संदेश भेजे जाने का आरोप लगाया गया है। युवती की शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामले में मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस का कहना है कि मामले से जुड़े आरोपों और साक्ष्यों की जांच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
August 11, 2026चमोली जिले में तबाही के बीच अपनों की खोज कागजी दावों पर भारी पड़ रहा प्रकृति का गुस्सा जलसैलाब में पुल, वाहन बहे, एक कर्मी लापता सवाल राहत की तस्वीरें आ गई पर जवाब कब देहरादून। चमोली में पानी आया और अपने साथ सिर्फ पुल और गाड़ियां नहीं ले गया। वह अपने साथ उन परिवारों की नींद भी बहा ले गया, जिनके अपने अचानक लापता हो गए। सड़क बनाने वाले, पुल खड़े करने वाले और सीमा तक पहुंच का रास्ता तैयार करने वाले बीआरओ के कर्मी भी इस जलसैलाब की चपेट में आ गए। पहाड़ में जब पानी अपना रास्ता बदलता है तो आदमी के बनाए रास्ते कितने कमजोर हैं, यह कुछ ही मिनटों में साफ हो जाता है। एक तरफ उफनता पानी था, दूसरी तरफ पहाड़। बीच में इंसान था, उसकी मशीनें थीं, सड़क थी और वह पुल था जिस पर भरोसा करके लोग इस दुर्गम इलाके में आवाजाही करते हैं। फिर पानी आया और पुल नहीं रहा। गाड़ियां नहीं रहीं। कुछ लोग लौटकर नहीं आए। अब प्रशासन खोज रहा है। टीमें लग रही हैं। राहत और बचाव का काम चल रहा है। तस्वीरें आएंगी। हेलीकाप्टर उड़ेंगे। अधिकारियों के बयान आएंगे। बताया जाएगा कि हालात पर नजर रखी जा रही है। लेकिन पहाड़ का सबसे बड़ा सवाल इन बयानों के बीच कहीं खो जाता है आखिर हर बार पहाड़ ही क्यों बताता है कि हमने तैयारी कितनी कम की थी?चमोली कोई पहली बार बारिश देखने वाला इलाका नहीं है। यहां बादल फटने, अतिवृष्टि, भूस्खलन और अचानक आने वाले जलसैलाब का खतरा नया नहीं है। फिर भी हर बड़ी घटना के बाद हमारी भाषा वही रहती है अचानक, अप्रत्याशित, प्राकृतिक आपदा। प्रकृति निश्चित रूप से अपने रास्ते में किसी की अनुमति नहीं लेती। लेकिन क्या खतरे का अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता? यही वह सवाल है जिसे पूछना जरूरी है। एक पुल टूटता है तो प्रशासन के कागज पर वह एक ढांचा होता है। लेकिन गांव के आदमी के लिए पुल बाजार तक पहुंच है। स्कूल जाने का रास्ता है। अस्पताल जाने का रास्ता है। रोजगार तक पहुंच है और पहाड़ में कई बार पुल का मतलब दुनिया से जुड़ा रहना होता है। इसलिए जब जलसैलाब किसी पुल को बहा ले जाता है तो उसके साथ सिर्फ निर्माण सामग्री नहीं जाती। लोगों का भरोसा भी टूटता है और जब उसी घटना में सड़क और सीमा से जुड़े काम में लगे कर्मी लापता हो जाएं, तब यह हादसा और भी गंभीर हो जाता है। उनके घरों में इस समय कोई सरकारी प्रेस नोट नहीं पढ़ा जा रहा होगा। वहां सिर्फ एक सवाल होगा कि वह वापस कब आएंगे?हमारी आपदा पत्रकारिता की एक अजीब आदत है। पहले संख्या आती है। कितने पुल बहे? कितनी गाड़ियां बहीं? कितने लोग लापता? कितनी सड़कें बंद? फिर तस्वीरें आती हैं। फिर दौरा होता है। फिर समीक्षा बैठक होती है। फिर मुआवजे की घोषणा होती है। लेकिन कुछ दिनों बाद जब कैमरे दूसरी खबर की ओर चले जाते हैं, तब उन परिवारों का क्या होता है? जिस घर का आदमी वापस नहीं आया, वहां बारिश खत्म होने के बाद भी इंतजार खत्म नहीं होता। जिस सड़क का पुल बह गया, वहां मौसम साफ होने के बाद भी रास्ता नहीं बन जाता और जिस पहाड़ में एक हादसा हुआ, वहां अगली बारिश तक वही खतरा फिर खड़ा रहता है।उत्तराखंड में विकास जरूरी है। सड़क चाहिए। पुल चाहिए। सुरंग चाहिए। सीमा तक बेहतर संपर्क चाहिए। गांवों को बाजार और अस्पताल से जोड़ना जरूरी है। लेकिन विकास का अर्थ पहाड़ की प्रकृति को नजरअंदाज करना नहीं हो सकता। जब पहाड़ की ढलान, नदी का प्राकृतिक बहाव, जल निकासी और भूगर्भीय स्थिति को नजरअंदाज करके निर्माण होता है, तब प्रकृति की पहली बड़ी परीक्षा में हमारी इंजीनियरिंग कटघरे में खड़ी हो जाती है। सवाल यह नहीं कि सड़क क्यों बनाई गई। सवाल यह है कि सड़क कैसे बनाई गई? सवाल यह नहीं कि पुल क्यों बनाया गया। सवाल यह है कि क्या पुल उस जलधारा और उस संभावित दबाव को ध्यान में रखकर बनाया गया था? और सबसे बड़ा सवाल क्या हमने आपदा को केवल राहत और मुआवजे का विषय बना दिया है, जबकि उसे निर्माण और योजना का विषय होना चाहिए था? बीआरओ कर्मियों की कहानीसीमा से जुड़े इलाकों में काम करने वाले बीआरओ कर्मी अक्सर उस भारत की तस्वीर हैं जो नक्शे पर दिखाई नहीं देता, जहां सामान्य परिस्थितियों में पहुंचना मुश्किल है, वहां सड़क बनाना आसान काम नहीं। बारिश, बर्फ, भूस्खलन और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बीच काम करने वाले इन लोगों के लिए पहाड़ रोज की चुनौती है। जलसैलाब में लापता कर्मियों की खबर इसलिए सिर्फ एक दुर्घटना की खबर नहीं है। यह उन लोगों की कहानी है जो दूसरों के लिए रास्ते बनाते हैं और कभी-कभी उन्हीं रास्तों के बीच खुद रास्ता खो देते हैं। उनके परिवारों के सवालों का जवाब सिर्फ मुआवजे से नहीं दिया जा सकता। उन्हें जवाब चाहिए। खोज चाहिए और यह भरोसा चाहिए कि अगर ऐसी परिस्थितियां दोबारा बनती हैं तो व्यवस्था पहले से तैयार होगी। आपदा की तस्वीरहर साल बारिश में उत्तराखंड की तस्वीरें देशभर में पहुंचती हैं। उफनती नदियां। टूटती सड़कें। भूस्खलन। फंसे यात्री। बचाव अभियान। हेलीकाप्टर और पहाड़ की गोद में खड़ा कोई आदमी, जो कैमरे के सामने कहता है साहब, रास्ता कब खुलेगा? फिर खबर खत्म। लेकिन पहाड़ की जिंदगी खबर खत्म होने के बाद शुरू होती है। चमोली के इस जलसैलाब के बाद भी यही होना चाहिए कि राहत और बचाव सबसे पहली प्राथमिकता बने। लापता लोगों की तलाश पूरी ताकत से हो। प्रभावित परिवारों को तत्काल सहायता मिले। लेकिन इसके बाद एक ईमानदार समीक्षा भी हो। क्यों पुल बहा? क्यों वाहन सुरक्षित नहीं रह सके? कहां चेतावनी व्यवस्था कमजोर थी? क्या निर्माण मानकों का पालन हुआ? क्या नदी और जलधाराओं के पुराने रास्तों का अध्ययन किया गया? क्या संवेदनशील क्षेत्रों में काम कर रहे कर्मचारियों के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था थी? इन सवालों के जवाब अगर नहीं खोजे गए तो अगली बारिश फिर यही सवाल लेकर आएगी और तब शायद कोई दूसरा पुल होगा। कोई दूसरी गाड़ी होगी। कोई दूसरा परिवार इंतजार कर रहा होगा। पहाड़ को हर साल यह साबित करने की जरूरत […]
August 11, 2026संसद के मानसून सत्र के अब केवल चार कार्य दिवस बचे हैं और सदन के भीतर कामकाज से ज्यादा शोर दिखाई दे रहा है। सरकार के पास महत्वपूर्ण विधेयकों की लंबी सूची है, विपक्ष के पास सवालों की लंबी फेहरिस्त है और जनता के पास यह देखने के अलावा फिलहाल कोई विकल्प नहीं कि उसके नाम पर चल रही संसद आखिर कितनी देर तक एक-दूसरे को सुनने के लिए तैयार होती है। महिला आरक्षण, परिसीमन और विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी एफसीआरए से जुड़े प्रस्ताव महज कुछ विधेयक नहीं हैं। इनका असर आने वाले वर्षों की राजनीति, प्रतिनिधित्व, चुनावी भूगोल और नागरिक समाज के कामकाज तक पड़ सकता है। ऐसे विषयों पर संसद में व्यापक बहस होनी चाहिए। लेकिन विडंबना यह है कि इन महत्वपूर्ण सवालों के बीच संसद स्वयं संवाद के संकट में फंसी हुई है। संसदीय गतिरोध कोई नई बात नहीं है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं। लेकिन मतभेद और गतिरोध में फर्क है। मतभेद लोकतंत्र को मजबूत करते हैं, जबकि लगातार गतिरोध लोकतंत्र की संस्थागत क्षमता को कमजोर करता है। संसद का काम केवल विधेयक पारित करना नहीं, बल्कि सरकार से सवाल पूछना, नीतियों की समीक्षा करना और जनता की चिंताओं को आवाज देना भी है। इसीलिए सरकार का यह कहना कि गृह मंत्री अमित शाह छात्रों से जुड़े मुद्दे पर सदन में बयान देने को तैयार हैं, महत्वपूर्ण है। लेकिन इसके साथ यह शर्त जोड़ना कि विपक्ष बाधा उत्पन्न न करे, समाधान की दिशा में आधा कदम ही है। सरकार को बयान देना है तो उसे विपक्ष को सुनने की तैयारी भी दिखानी होगी। विपक्ष को सवाल पूछने हैं तो उसे सदन को चलने देने की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी होगी। लोकतंत्र में संवाद कभी शर्तों पर नहीं चलता। संवाद की शुरुआत ही इस स्वीकार से होती है कि सामने वाला पक्ष भी अपनी बात रखने का अधिकार रखता है। छात्रों से जुड़े मुद्दे पर सरकार से जवाब मांगना विपक्ष का अधिकार है। यदि पुलिस कार्रवाई या किसी प्रशासनिक निर्णय को लेकर सवाल उठे हैं तो उनका जवाब संसद में मिलना चाहिए। लेकिन उसी समय यह भी जरूरी है कि संसद को जवाब मांगने के मंच से जवाब सुनने के मंच में बदला जाए। यदि विपक्ष केवल नारे लगाए और सरकार केवल संख्याबल के भरोसे विधेयक पारित कराने की कोशिश करे, तो दोनों ही संसद की मूल भावना से दूर जा रहे होंगे। सबसे बड़ा सवाल महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर है। महिला आरक्षण का मुद्दा आधी आबादी के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा है। परिसीमन देश के चुनावी नक्शे और प्रतिनिधित्व की संरचना को प्रभावित कर सकता है। ऐसे विषयों पर जल्दबाजी में राजनीतिक सहमति का दावा करना उतना ही गलत होगा, जितना अनिश्चितकाल तक चर्चा को रोक देना। परिसीमन का सवाल विशेष रूप से संवेदनशील है क्योंकि इसमें राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व, जनसंख्या और संघीय संतुलन जैसे प्रश्न जुड़े हैं। दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को नजरअंदाज करके कोई भी बड़ा फैसला व्यापक राजनीतिक सहमति के बिना टिकाऊ नहीं हो सकता। संसद बहुमत की ताकत से कानून तो बना सकती है, लेकिन लोकतंत्र में हर कानून की राजनीतिक वैधता केवल वोटों की संख्या से तय नहीं होती। इसी तरह एफसीआरए में प्रस्तावित बदलावों पर भी संसद में खुली बहस होनी चाहिए। विदेशी धन के दुरुपयोग पर निगरानी जरूरी है, लेकिन नागरिक समाज संगठनों की स्वतंत्रता और उनके वैध कामकाज को लेकर उठने वाली चिंताओं का जवाब भी सरकार को देना होगा। सुरक्षा और पारदर्शिता के नाम पर नियंत्रण बढ़ाना आसान है, चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि नियंत्रण और स्वतंत्रता के बीच लोकतांत्रिक संतुलन बना रहे। विडंबना देखिए कि संसद के पास इन सभी सवालों पर चर्चा के लिए समय कम है और राजनीतिक अविश्वास बढ़ता जा रहा है। चार दिन में बहुत कुछ हो सकता है, लेकिन तभी जब सरकार और विपक्ष दोनों यह समझें कि संसद चुनावी अखाड़ा नहीं, संवैधानिक संस्था है। सरकार को अपनी विधायी प्राथमिकताओं पर विपक्ष से बातचीत करनी चाहिए। विपक्ष को भी यह तय करना होगा कि सदन को रोकना उसकी रणनीति का स्थायी विकल्प नहीं हो सकता। सरकार जवाब दे, विपक्ष सवाल पूछे और फिर सदन निर्णय करे यही संसदीय लोकतंत्र का सामान्य रास्ता है। आज जरूरत इस बात की नहीं है कि कौन संसद में ज्यादा देर तक नारे लगाता है। जरूरत इस बात की है कि कौन जनता के सवालों को ज्यादा देर तक संसद के भीतर जिंदा रखता है। मानसून सत्र के यह आखिरी चार दिन इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनके सामने केवल कुछ विधेयकों का भविष्य नहीं है। इनके सामने संसद की कार्यसंस्कृति का सवाल भी है। क्या सत्ता पक्ष बहुमत को संवाद का विकल्प मानेगा? क्या विपक्ष विरोध को सदन चलने देने की जिम्मेदारी के साथ संतुलित करेगा? और क्या सरकार ऐसे संवेदनशील संवैधानिक मुद्दों पर व्यापक सहमति बनाने की कोशिश करेगी? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलेंगे। संसद की गरिमा किसी एक दल की संपत्ति नहीं है। सरकार आज सत्ता में है, कल विपक्ष में हो सकती है। विपक्ष आज विरोध में है, कल सत्ता में आ सकता है। लेकिन संसद और लोकतंत्र दोनों इन दलों से बड़े हैं। इसलिए आखिरी चार दिनों में सबसे जरूरी विधेयक शायद कोई विधेयक नहीं, बल्कि संवाद की वह परंपरा है जिसे बचाए बिना कोई भी कानून लोकतंत्र को मजबूत नहीं कर सकता। संसद चलेगी तो बहस होगी। बहस होगी तो असहमति होगी। असहमति होगी तो रास्ता निकलेगा। संसद का रुकना किसी की जीत नहीं हैकृयह लोकतंत्र की हार है।
August 10, 2026मुख्यमंत्री युवा विद्यार्थी मंथन कार्यक्रम में शामिल हुए सीएम पुष्कर सिंह धामी सीएम बोले – आज के विद्यार्थी ही भविष्य में उत्तराखंड और देश का नेतृत्व करेंगे देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोमवार को मुख्यमंत्री आवास स्थित मुख्य सेवक सदन, में आयोजित मुख्यमंत्री युवा विद्यार्थी मंथन कार्यक्रम में प्रतिभाग किया। इस अवसर पर उन्होंने “मुख्यमंत्री युवा विद्यार्थी मंथन” पोर्टल का भी शुभारंभ किया। इसी के साथ विद्यालयी छात्र छात्राओं के बीच होने वाली “मेरे सपनों का उत्तराखण्ड: एक विकसित राज्य हेतु मेरा दृष्टिकोण” विषय की निबंध प्रतियोगिता का शुभारंभ हो गया है।आयोजन के दौरान विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि इस निबंध प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले प्रदेश के 140 बच्चों को सम्मानित किया जाएगा। साथ ही इन चयनित छात्र- छात्राओं का NEET, JEE, CLAT, SAT जैसी प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग सहित एवं अन्य आवश्यक शुल्कों का वहन भी राज्य सरकार द्वारा किया जाएगा।इस कार्यक्रम में प्रदेश भर के 2828 सरकारी / गैर सरकारी स्कूलों के 11 एवं 12 वीं के 3 लाख से अधिक छात्र- छात्राओं ने वर्चुअल तरीके से प्रतिभाग किया। मुख्यमंत्री से संवाद के दौरान छात्र-छात्राओं ने खेलों को बढ़ावा देने, सप्ताह में चार दिन खेल पीरियड आयोजित करने, विद्यालयों में मिल रहे विभिन्न अवसरों को और बढ़ाने, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उत्तराखंड को अग्रणी बनाने, राज्य में पर्यटन गतिविधियों को प्रोत्साहित करने तथा विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देने सहित विभिन्न सुझाव दिए। मुख्यमंत्री ने छात्रों के सुझावों को गंभीरता से लेते हुए स्वयं नोट किया और अधिकारियों को इनके अनुरूप कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि छात्र-छात्राओं द्वारा दिए गए सुझावों को सरकार की नीतियों में भी शामिल किया जाएगा।संवाद के दौरान मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि छात्र-छात्राएं देश का वर्तमान और भविष्य हैं। उन्होंने कहा विद्यार्थियों को अपने सपनों को साकार करने की ओर आगे बढ़ना चाहिए। परीक्षा में नंबरों से ज्यादा विषयों की समझ होना जरूरी है। जीवन में संस्कार और अनुशासन अपनाने से सफलता अवश्य मिलती है। मुख्यमंत्री ने कहा छात्र छात्राओं को पढ़ने के तरीके को बदलने की आवश्यकता है। पढ़ाई को बोझ नहीं बल्कि भविष्य संवारने के रास्ते के तौर पर देखना होगा।मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि छात्र – छात्राओं को अपने जीवन में लीडर बनकर आगे बढ़ना है। लीडर वो होता है जो अपने क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ काम करता है। उन्होंने कहा अपने काम, समाज के प्रति संवेदना, और कार्य के प्रति लगन किसी के नाम को भी अमर बना सकती है। उन्होंने कहा कि जीवन में सफलता स्वयं आगे बढ़ने में नहीं, बल्कि दूसरों को आगे बढ़ाने में है। उन्होंने कहा कि हम सभी को अपनी प्रतिभा और ऊर्जा का सकारात्मक दिशा में उपयोग करते हुए समाज और प्रदेश के विकास में योगदान देना चाहिए।मुख्यमंत्री ने युवाओं से अपने लक्ष्य के प्रति निरंतर प्रयास करने और चुनौतियों से सीख लेकर आगे बढ़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा हमें अपने जीवन में संकल्प लेना चाहिए और उस संकल्प में कोई विकल्प नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा जब हम बिना विकल्प के संकल्प लेते हैं तो हमें और तेजी से सफलता मिलती है। मुख्यमंत्री ने कहा आज के विद्यार्थी ही भविष्य के उत्तराखंड और देश का नेतृत्व करेंगे।मुख्यमंत्री ने छात्रों से कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग तभी करें, जब उसकी वास्तव में आवश्यकता हो। उन्होंने कहा कि AI हमारे लिए उपयोगी और ज्ञानवर्धक है, लेकिन इसके अत्यधिक उपयोग के कुछ दुष्परिणाम भी हो सकते हैं। उन्होंने छात्रों से कहा कि किसी भी विषय पर सबसे पहले अपने विवेक, बुद्धि और सोचने की क्षमता का उपयोग करें तथा गुरुजनों के मार्गदर्शन और अनुभव से सीखें, इसके बाद आवश्यकता पड़ने पर AI की सहायता लें। उन्होंने कहा कि तकनीक हमारी सहयोगी होनी चाहिए, हमारी सोचने और सीखने की क्षमता का विकल्प नहीं।मुख्यमंत्री ने कहा कि पढ़ाई के साथ-साथ खेलों को भी बढ़ावा देना जरूरी है। उत्तराखंड में राष्ट्रीय खेलों के सफल आयोजन के साथ ही खेलों के प्रति युवाओं और समाज में नई जागरूकता पैदा हुई है। अब हमारे छात्र खेलों में भी अपना भविष्य देख रहे हैं और विभिन्न खेल विधाओं में आगे बढ़ने के लिए निरंतर मेहनत कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य सरकार द्वारा मुख्यमंत्री उदीयमान खिलाड़ी उन्नयन योजना भी लागू की गई है।मुख्यमंत्री ने कहा कि वे विद्यार्थियों की सोच, उनकी आकांक्षाओं और भविष्य को लेकर उनके मन में चल रहे विचारों से भली-भांति परिचित हैं। उन्होंने कहा कि उनके घर में स्वयं जैन अल्फा और जैन जी हैं, इसलिए वे नई पीढ़ी की सोच, उनकी रुचियों और भविष्य को लेकर उनकी आकांक्षाओं को करीब से समझते हैं।मुख्यमंत्री ने कहा कि छात्रों के लिए संवाद का रास्ता हमेशा खुला है। विद्यार्थी अपनी समस्याओं, सुझावों और विचारों को खुलकर साझा कर सकते हैं। सरकार युवाओं की बात सुनने और उनके सुझावों पर विचार करने के लिए हमेशा तत्पर है। उन्होंने कहा कि निरंतर संवाद से ही बेहतर समझ और बेहतर भविष्य का निर्माण संभव है।इस अवसर पर मीडिया सलाहकार समिति के अध्यक्ष प्रो.गोविंद सिंह, सचिव शिक्षा श्रीमती ज्योति यादव, अपर सचिव श्रीमती नमामि बंसल, महानिदेशक शिक्षा आकांक्षा कोंडे, श्री गोविंद राम जायसवाल, राहुल अग्रवाल, रिया अग्रवाल एवं अन्य लोग मौजूद रहे।
August 10, 202615 अक्टूबर तक किसी भी स्थिति में प्रदेश की सभी सड़कों को किया जाए गड्ढामुक्त देहरादून । मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोमवार को मुख्यमंत्री आवास से प्रदेश के समस्त जिलाधिकारियों के साथ वर्चुअल बैठक कर मानसून की स्थिति, चारधाम यात्रा, कांवड़ यात्रा, आपदा प्रबन्धन, जन-जन के द्वार कार्यक्रम, सत्यापन अभियान, गड्ढा मुक्त सड़के जैसे विभिन्न विषयों पर दिशा निर्देश दिए।मुख्यमंत्री ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिए कि मानसून के दृष्टिगत सतर्कता बढ़ाते हुए आपदा प्रबंधन तंत्र को पूरी तरह अलर्ट मोड पर रखा जाए। उन्होंने कहा कि सभी अधिकारी अपने फोन चालू रखें और किसी भी परिस्थिति में संपर्क से बाहर न रहें। किसी भी तरह की अनहोनी से निपटने के लिए सभी आवश्यक व्यवस्थाएं एवं तैयारियां सुनिश्चित की जाएं, ताकि मानसून के दौरान आमजन को किसी भी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े।मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि मानसून के दौरान आपदा अथवा अत्यधिक वर्षा के कारण जहां-जहां सड़कें क्षतिग्रस्त हुई हैं, मार्ग अवरुद्ध या टूटे हैं तथा ड्रेनेज सिस्टम में किसी प्रकार की समस्या उत्पन्न हुई है, उनका जिलाधिकारी स्तर पर विस्तृत विवरण तैयार किया जाए। उन्होंने कहा ऐसे स्थानों का चिन्हीकरण कर मानसून समाप्त होते ही क्षतिग्रस्त सड़कों, मार्गों एवं ड्रेनेज व्यवस्था के पुनर्निर्माण और मरम्मत कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर शुरू किया जाए।मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि मानसून समाप्त होते ही प्रदेशभर की सड़कों को गड्ढामुक्त करने का अभियान शुरू किया जाए। उन्होंने सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिये कि अपने-अपने जिलों में सड़कों को गड्ढामुक्त करने के लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार करते हुए समिति गठित करें और कार्यों की नियमित निगरानी सुनिश्चित करें। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि मानसून समाप्त होने के बाद 15 अक्टूबर तक किसी भी स्थिति में प्रदेश की सभी सड़कों को गड्ढामुक्त किया जाए।मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ कार्यक्रम में मानसून के बाद और तेजी लाई जाए। उन्होंने निर्देश दिए कि जिन क्षेत्रों एवं ग्रामों में अभी तक इन शिविरों का आयोजन नहीं हुआ है, वहां प्राथमिकता के आधार पर कैंप आयोजित कर अधिक से अधिक लोगों को सरकारी योजनाओं एवं सेवाओं का लाभ पहुंचाया जाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि ये शिविर महज औपचारिकता नहीं, बल्कि आमजन की सुविधा और उनकी समस्याओं के त्वरित समाधान का माध्यम हैं।मुख्यमंत्री ने 1905 मुख्यमंत्री हेल्पलाइन की नियमित समीक्षा करने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने राज्यभर में चल रहे सत्यापन अभियान में भी तेजी लाने के निर्देश देते हुए कहा कि राशन कार्ड, आयुष्मान कार्ड सहित विभिन्न सरकारी योजनाओं में अपात्र लोगों का चिन्हीकरण कर नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई की जाए, ताकि योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक पहुंच सके। उन्होंने राज्य में स्टेट सेक्टर फिजिकल वेरिफिकेशन में भी तेजी लाने के निर्देश दिए।मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत राज्यभर में 5 वर्ष की अवधि पूर्ण कर चुकी एवं खराब स्थिति वाली सड़कों को चिन्हित करने के निर्देश भी दिए। उन्होंने कहा कि ऐसी सड़कों की स्थिति का आकलन कर उनके डामरीकरण एवं सुधार के लिए कार्ययोजना तैयार की जाए। साथ ही, आवश्यकता के अनुसार इन सड़कों को लोक निर्माण विभाग को हस्तांतरित करने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई जाए। जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर एवं सुगम सड़क सुविधा सुनिश्चित हो सके।मुख्यमंत्री ने मुख्यमंत्री घोषणाओं के अंतर्गत स्वीकृत कार्यों में तेजी लाते हुए उन्हें प्राथमिकता के आधार पर धरातल पर उतारने के निर्देश दिए। उन्होंने जिलाधिकारियों को निर्देश दिए कि घोषणाओं से संबंधित कार्यों की नियमित समीक्षा एवं मॉनिटरिंग सुनिश्चित की जाए, ताकि विकास कार्य समयबद्ध रूप से पूर्ण हो सकें और उनका लाभ आमजन तक पहुंच सके।मुख्यमंत्री ने कांवड़ यात्रा के बाद स्वच्छता अभियान में और तेजी लाने के निर्देश दिए। उन्होंने नशे के खिलाफ अभियान को प्रभावी बनाते हुए अवैध नशीले पदार्थों की बिक्री एवं तस्करी पर कड़ी कार्रवाई करने तथा ट्रैफिक व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के भी निर्देश दिए।मुख्यमंत्री ने जिलाधिकारियों को कृषि, बागवानी एवं पशुपालन से जुड़ी योजनाओं पर विशेष ध्यान देते हुए अधिक से अधिक पात्र लाभार्थियों को इनसे जोड़ने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि इन योजनाओं का लाभ समयबद्ध एवं प्रभावी तरीके से किसानों, पशुपालकों और ग्रामीणों तक पहुंचाया जाए, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के अवसर बढ़ने के साथ-साथ उत्तराखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और मजबूती मिल सके।इस अवसर पर प्रमुख सचिव श्री आर.के सुधांशु, वर्चुअल माध्यम से आयुक्त कुमाऊं श्री दीपक रावत, गढ़वाल श्री आनंद स्वरूप, आईजी कुमाऊं निवेदिता कुकरेती, गढ़वाल श्री राजीव स्वरूप, एवं सभी जिलों के जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक एवं पुलिस अधीक्षक मौजद रहे।