- समिति ओबीसी आरक्षण पर नहीं कर सकी स्पष्ट फैसला
- फिलहाल समिति की रिपोर्ट को बैकग्राउंड में रखा
देहरादून। उत्तराखंड के निकाय चुनाव कब होंगे इस सवाल का अभी कोई स्पष्ट जवाब किसी के पास नहीं है। निकायों का कार्यकाल पूरा होने के बाद निकायों का काम—काज प्रशासनो के हवाले है। इस मामले को लेकर जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं के बीच वाक युद्ध जारी है। वहीं आज राजधानी दून में विधानसभा की प्रवर समिति की अंतिम और तीसरी बैठक हुई जिसमें ओबीसी आरक्षण पर कोई फैसला न हो पाने के कारण अब प्रवर समिति की रिपोर्ट को बैकग्राउंड में ही रखने का फैसला लिया गया है। लेकिन प्रवर समिति के सदस्यों का एकमत से यह भी कहना जरूर है कि निकायों के चुनाव इसी साल यानी 2024 में ही होने चाहिए इन्हें 2025 के लिए नहीं टाला जाना चाहिए।
सरकार द्वारा 10 नवंबर को चुनाव की अधिसूचना जारी तथा नामांकन आदि चुनावी कार्य पूरा कर 15 से 20 दिसंबर तक चुनाव कराने का कार्यक्रम तैयार किया गया है। निकाय चुनाव से पूर्व ओबीसी आरक्षण का संशोधन विधेयक विधानसभा की प्रवर समिति को सौंप दिए जाने से इसका इंतजार लंबा खिंचता चला गया। आयोग भी अब इसी के अनुसार चुनावी तैयारी करने में जुटा है। प्रवर समिति का कार्यकाल 8 अक्टूबर को समाप्त हो रहा है लेकिन ओबीसी आरक्षण पर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है।
प्रवर समिति की बैठक में अब यह फैसला लिया गया है कि समिति की रिपोर्ट को अभी बैकग्राउंड में ही रखा जाए और चुनाव इसी साल करा लिए जाए। समिति की बैठक में सदस्यों ने इस बात की आशंका जताई है कि ओबीसी की गिनती में गड़बड़ी हो सकती है तथा उत्तर प्रदेश और हिमाचल के ओबीसी को भी उत्तराखंड के ओबीसी में गिना जा सकता है, जो उचित नहीं होगा।
उधर इस मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का कहना है कि भाजपा चुनाव से डर कर भाग रही है। उन्होंने कहा कि जब ओबीसी आरक्षण संशोधन विधेयक को विधानसभा अध्यक्ष ने प्रवर समिति को सौंपा था तभी यह स्पष्ट हो गया था कि भाजपा किसी भी तरह चुनाव टालना चाहती है। उन्होंने कहा कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का अपहरण करना ही है।




