Home उत्तराखंड देहरादून संविधान बदलकर क्या होगा?

संविधान बदलकर क्या होगा?

0
460


इन दिनों देश में संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद जैसे शब्दों पर बहस छिड़ी हुई है। विश्व का सबसे पुराना और बड़ा लोकतंत्र होने का जो गौरव भारत को प्राप्त हुआ है वह सम्मान देश को हमारे उस संविधान के कारण ही मिला है जिसे बदलने की चर्चा हम लंबे समय से सुनते चले आ रहे हैं। अमृत काल का ढोल पीटने वाले वर्तमान दौर के नेता अगर उसे दौर में रहे होते जब देश को आजादी के बाद एक ऐसे संविधान की जरूरत थी जिसकी रोशनी में देश का सर्वांगीण विकास हो सके तो आप समझ सकते हैं कि उन्होंने कैसा संविधान लिखा होता। जिन नेताओं का सरोकार सर्व धर्म समभाव से नहीं है और न सामाजिक समानता से तथा न ही राष्ट्रीय एकता से वह आज इस बात पर बहस करने में लगे हुए हैं कि संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष और समाजवाद जैसी शब्दों का कोई महत्व नहीं है इसलिए उन्हें हटा दिया जाना चाहिए। खास तौर पर यह बात गौरतलब है कि यह वह नेता है जिन्होंने हिंदू मुस्लिम एससी—एसटी और ओबीसी तथा मंदिर—मस्जिद के अलावा आज तक किसी अन्य मुद्दे पर कभी राजनीति की ही नहीं। जाति धर्म और क्षेत्रवाद के नाम पर देश के लोगों को लड़ाने, दंगे कराने और उस पर वोट बटोरने के अलावा उनके पास कुछ अन्य सोचने के लिए है ही नहीं। इस बात को सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि देश के संविधान की मूल भावना क्या है। राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय हितों का संरक्षण अगर धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी सोच से नहीं किया जा सकता तो अन्य दूसरी सोच क्या हो सकती है जो इससे बेहतर हो, इस सवाल का जवाब इन नेताओं के पास देने के लिए भले ही न हो लेकिन देश की अन्य गंभीर समस्याओं से ध्यान कैसे भटकाना है और कैसे निरर्थक मुद्दों में देश की जनता को उलझाना है यही उनका सबसे बड़ा राजनीतिक कौशल है। इन नेताओं से यह पूछा जाना चाहिए कि वह कैसा संविधान चाहते हैं और अगर इन शब्दों को संविधान से हटा दिया गया तो इससे देश तथा देश के समाज का क्या भला हो जाएगा? आज देश मे चारों ओर बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी के कारण हा—हा कार मचा हुआ है देश का गरीब और अधिक गरीब होता जा रहा है किसान आत्महत्या करने पर विवश हैं। सत्ता में बैठे लोगों ने इन समस्याओं का क्या समाधान किया है या उनके पास इन समस्याओं से निपटने की क्या कार्य योजना है इस पर बात करने की बजाय बात हो रही है संविधान से धर्मनिरपेक्ष और समाजवाद जैसे शब्दों को हटाने पर। एक राष्ट्र एक चुनाव और कभी विकसित भारत और विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का भ्रम फैलाकर या फिर संविधान को बदलने पर बहस से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। अगर कुछ हो सकता है तो उसके लिए देश के नेताओं को अपनी सोच बदलने की जरूरत है। देश की एकता और अखंडता तथा सामाजिक समरसता और सामाजिक समानता की सोच के साथ ही देश को विकास और राष्ट्रीयता की मजबूती प्रदान की जा सकती है इस देश के वर्तमान नेताओं में अगर दम है तो वह वोट की राजनीति छोड़कर देश के लिए राजनीति करने की हिम्मत दिखाएं। बीते 75 सालों से वह जो करते रहे हैं उसे पीछे छोड़कर सिर्फ उस पर सोचे जो आने वाले समय में किया जाना चाहिए। खराबी संविधान में नहीं नेताओं की सोच में है जिसे बदले जाने की जरूरत है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here