एक तरफ उत्तराखंड का वह प्राकृतिक सौंदर्य जो इस देवभूमि के एक नैसर्गिक स्वर्ग होने का एहसास कराता है और दूसरी तरफ वह प्राकृतिक आपदाएं जिससे हम कोई सबक लेने को तैयार नहीं तथा विकास के नाम पर विनाश की ओर ले जाने वाली अंधी दौड़ का हिस्सा बन चुके हैं। इन दोनों स्थितियों के बीच न तो राज्य के आम लोगों को यह समझ आ रहा है कि इसका समाधान क्या है और न सत्ता में बैठे लोगों में इसके प्रति कोई सजगता दिखाई दे रही है। चार धाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के हर साल नए कीर्तिमानो का भूत तो सत्ता पर सवार है लेकिन उनकी सुरक्षा और सुविधाओं को नजर अंदाज करने का नतीजा ही है कि साल दर साल मानसून काल की आपदाओं में और उनसे होने वाले जान माल के नुकसान में लगातार वृद्धि होती जा रही है। इन आपदाओं के समय शासन—प्रशासन द्वारा शॉर्ट टर्म उपाय तो किए जाते हैं लेकिन हम 2013 की केदारनाथ आपदा जिसमें 10 हजार से भी अधिक लोग काल के गाल में समा गए जिनका सही आंकड़ा तक नहीं जुटा जा सके और अभी 3 साल पूर्व जोशीमठ में हुई भू धसाव की घटना जिसने इस ऐतिहासिक शहर के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया जैसी बड़ी घटनाओं से न तो कोई सबक लेने को तैयार है और न समस्या के समाधान के लिए कोई गंभीर पहल करने को तैयार। हर साल सैकड़ो और हजारों की तादाद में लोग मर रहे हैं जान माल का भारी नुकसान हो रहा है पहाड़ दरक रहे हैं नदी—नाले और खालों का प्राकृतिक स्वरूप बिगड़ने से वह रौद्र रूप धारण करते जा रहे हैं मानसून काल में अति वृष्टि और बादल फटने की घटनाएं बढ़ती जा रही है लेकिन इस बात पर गौर करने के लिए कोई भी तैयार नहीं है कि इसके पीछे मूल कारण क्या है? आपदा के समय यात्रा को रोक देना स्कूलों को बंद कर देना तथा आपदा के समय बचाव और राहत कार्य करके हम अपने कर्तव्यों से पल्ला झाड़ लेते हैं। चारधाम ऑल वेदर रोड निर्माण जैसे बड़े प्रोजेक्ट में क्या इस हिमालयी राज्य की अति संवेदनशील स्थिति के तहत नियम कानूनों का पालन किया गया? अगर इस पर एक बार भी गौर किया गया तो 900 किलोमीटर लंबे इस मार्ग के निर्माण के लिए 56 हजार से अधिक पेड़ों का काटा जाना और उसके लिए पहाड़ों को तोड़ा जाने का जो काम किया गया क्या उसके मलबे के उचित निस्तारण की भी कोई व्यवस्था की गई। 25 सालों में राज्य में 50 हजार किलोमीटर से अधिक लंबी सड़कों का निर्माण किया गया है तथा पहाड़ कटान से निकले मलवे को खाइयो में धकेलने या नदी नालों और खालो में खपाने का काम होता रहा है लेकिन न तो पेड़ों के कटान को लेकर और मलबे के निस्तारीकरण को लेकर किसी के द्वारा प्रभावी तरीके से इसका विरोध किया गया है न ही कोई कोशिश की गई, जिसका नतीजा है पहाड़ के मौसम और नदियों—नालों के स्वरूप में आया बदलाव, जिसका अब खामियाजा हमें भूस्खलन और बाढ़ तथा अन्य तमाम आपदाओं के रूप में झेलना पड़ रहा है। चार धामों में उनकी केयरिंग कैपेसिटी के अनुसार यात्रियों को पहुंचाने की बात हम कई साल से सुनते चले आ रहे हैं लेकिन इस पर कितना अमल किया गया है इसकी गवाही खुद हर साल बढ़ती जा रही यात्रियों की संख्या दे रही है। पहाड़ में 25 सालों में कितना अनियोजित विकास हुआ है यह हम सभी जानते हैं इसके साथ ही यह भी जानते हैं कि इसके भावी परिणाम क्या होंगे लेकिन इन विकास योजनाओं के कमीशन तक ही सत्ता की नजरें सीमित है भविष्य के खतरों तक किसी के द्वारा सोचने की जरूरत नहीं समझी जा रही है यह सबसे ज्यादा चिंतनीय है।



