नैनीताल हाईकोर्ट द्वारा पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद पहले चुनाव पर रोक लगाई गयी और फिर तीन दिन बाद ही रोक को हटा भी दिया गया। रोक लगाने ओर हटाने के इस फैसले को लेकर कांग्रस नेता गणेश गोदियाल का कहना है कि यह फैसला उनके गले नहीं उतरा है। उनका साफ कहना है कि सरकार के द्वारा जिस आधार पर आरक्षण की व्यवस्था दी या आरक्षण रोटेशन किया गया उसे असंवैधानिक बताते हुए जिन लोगों द्वारा 39 याचिकाएं दायर की गयी और उसमें यह कहा गया कि उन्हें चुनाव लडने के संवैधानिक अधिकार से वंचित किया जा रहा है, अगर सही नहीं था तो कोेर्ट ने चुनाव पर रोक क्यों लगाई गयी? और अगर सही था या सही है तो उन्हें बिना न्याय दिये इस पर रोक को क्यों हटा दिया गया? कोर्ट ने चुनाव कराने और याचिका कर्ताओं की अपील सुनवाई जारी रखने की प्रक्रिया को साथ—साथ चलते रहने की जो व्यवस्था दी गयी है वह कैसे न्याय संगत है यह उनसे तो क्या किसी के भी गले नहीं उतर सकती है। वह थलीसैंण और बीरौंखल विकास खण्ड का उदाहरण देते हुए कहते हैं, बीते 40 सालों में इन पंचायतों व विकास खण्ड के लोगों के जीवन में यह मौका नहीं आया कि जिनके लिए यह सीटें आरक्षित हैं उन्हें चुनाव लड़ने का मौका ही नहीं मिला। यह संविधान की मूल भावना के अनुरूप है या विपरीत है। उनका कहना है कि मैं जो कह रहा हूं उसके लिए अगर मुझे सजा भी होती है तो हो जाए लेकिन मैं स्वयं को यह कहने से रोक नहीं सकता हूं क्याेंकि मैं कांग्रेस का नेता ही नहीं हूं उत्तराखण्ड का नागरिक भी हूं। वह न्यायालय के इस फैसले को एक ऑन गोइंग प्रक्रिया बताते हुए कहते हैं कि हो सकता है याचिकाकर्ता इसके खिलाफ बड़ी अदालत में भी जाए। ख्ौर कुल मिलाकर अब हाईकोर्ट द्वारा पंचायत चुनाव पर लगी रोक को हटा लिया गया है और चुनाव आयोग सरकार से विमर्श के बाद फिर नई अधिसूचना जारी करने की तैयारी में जुट गया है और सरकार भी चुनाव को तैयार है। हालांकि कोर्ट ने कई बिंदुओं पर 3 सप्ताह में जवाब भी मांगा है। उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद सिर्फ निकाय ओर पंचायत चुनावों को लेकर ही नहीं और भी तमाम मुद्दों को लेकर अनेक ऐसी समस्याएं और मसले हैं जो कानूनी पेंचीदगी में उलझी हुई है। वर्तमान सरकार के कार्यकाल में एक देश एक चुनाव जैसी तमाम बातों के बड़े—बड़े दावे किये जाते रहे हैं लेकिन जमीनी हकीकत एक दम अलग है। उत्तराखण्ड जैसे राज्य में अगर एक साथ पंचायत चुनाव भी नहीं कराये जा सकते हैं तो एक देश एक चुनाव की बात से बड़ा मजाक क्या हो सकता है? लेकिन देश इस समय सिर्फ हवा हवाई बातों और वायदों पर ही चल रहा है। वर्तमान दौर की राजनीति का सच यही है और इसे देश का हर नागरिक अब भली प्रकार जान समझ चुनाव है।


