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मुफ्त की रेवड़ियों में गिरवी वोट

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किसी भी देश की सेहत का हाल कैसा है? इसका निर्धारण अर्थशास्त्रियों द्वारा उस देश की जीडीपी, डॉलर के मुकाबले उस देश की मुद्रा की वैल्यू, रोजगार और महंगाई की दर के आधार पर किया जाता है। अभी—अभी देश की जीडीपी की जो दर सामने आई है वह चार फीसदी के पास है। जो पिछले दो सालों में सबसे कम है। खास बात यह है कि बीते दो सालों से इसमें निरंतर गिरावट दर्ज की जा रही है। बात अगर रुपए के अंतरराष्ट्रीय बाजार में अवमूल्यन की करें तो बीते समय में डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है। हालत इतनी खराब हैं कि रुपया रिकॉर्ड गिरावट के साथ एक डॉलर के मुकाबले 84 रुपए हो गया है। देश में महंगाई और बेरोजगारी की स्थिति क्या है इसका सच भी किसी से छुपा नहीं है। देश में बीते दो सालों में महंगाई ने अपने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ डाले हैं। देश की युवा शक्ति किस कदर बेरोजगारी की मार झेल रही है इसका सच इन दिनों किसी भी भर्ती के दौरान उमड़ने वाली बेरोजगारों की भीड़ से समझा जा सकता है। सवाल यह है कि जिस जीडीपी की दर 8 प्रतिशत से ऊपर होने की बात कही जा रही है वह अगर आधी रह जाती है तो यह स्पष्ट बात है कि देश के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की हालत अत्यंत ही खराब है। देश का एसएमई सेक्टर बुरी तरह तबाह हो चुका है छोटे कारोबारी और व्यापारी बुरे दौर से गुजर रहे हैं। सबसे अहम बात यह है कि देश के नेता इस स्थिति पर कोई बात और चर्चा तक करने को तैयार नहीं है। देश की 70 फीसदी आबादी बदहाली की उसे कगार पर पहुंच चुकी है कि उसके लिए अब सरकार से मिलने वाली सहायता ही उसके जीवन का आधार बनती जा रही है। बात चाहे मुफ्त के राशन बांटे जाने की हो अथवा लाडली बहना जैसी तमाम उन योजनाओं की जिनके जरिए एक दो या तीन हजार रुपए नगद लाभार्थियों के खातों में डाले जा रहे हैं। अथवा किसान सम्मान निधि जैसी और उज्ज्वला गैस जैसी योजनाओं की जो समाज से आत्मनिर्भरता की भावना को छीन चुकी हैं और आम आदमी के वोट की कीमत की अहमियत हासिल करती जा रही है। आम आदमी के जीवन का सहारा बन चुकी इन मुक्त की रेवड़ियों से समाज का इस तरह आश्रित हो जाना कि लोग इनसे प्रभावित होकर वोट देना है यह तय करने लगे तो आप समझ सकते हैं कि देश और समाज की सेहत कितनी अधिक खराब हो चुकी है। 2014 में भाजपा ने सत्ता में आने के बाद रसोई गैस, डीजल व पेट्रोल के साथ अन्य तमाम वस्तुओं पर दी जाने वाली सब्सिडी को कम या समाप्त करने से जो काम शुरू किया गया था वह अब मुफ्त की रेवड़ियां बांटने और आम आदमी को उसे हद तक लाचार व विवश बनाने तक पहुंच चुका है कि उसकी जेब तो खाली हो ही चुकी है जो जमा पूंजी थी वह भी समाप्त होती जा रही है। खास बात यह है कि जनता का ध्यान भटकाने के लिए न जाने कैसे—कैसे मुद्दे तैयार किये जा रहे हैं। महंगाई—बेरोजगारी जैसी समस्याओं या फिर अत्यधिक बढ़ती जनसंख्या पर बात करने को कोई तैयार नहीं है।

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