भले ही अब मानसून अपनी विदाई की ओर अग्रसर है लेकिन उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य के लिए यह मानसून किसी बड़ी आपदा से कम नहीं रहा है। तीन माह से भारी बारिश की मार झेलने वाले उत्तराखंड को इस मानसूनी सीजन में भारी जान—माल का नुकसान झेलना पड़ा है। सबसे अधिक नुकसान सड़कों को पहुंचा है वहीं अब तक 70 के आस—पास लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। अतिवृष्टि के कारण भूस्खलन की घटनाएं तो बीते साल की तुलना में दो गुना से भी अधिक हुई। जिनकी संख्या 3000 से भी अधिक रही है। भूस्खलन की चपेट में आकर न सिर्फ वाहनों को नुकसान पहुंचा है बल्कि सड़कों के बंद होने की वजह से जगह—जगह यात्रियों के फंसने और उनका रेस्क्यू करने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। राज्य की छोटी बड़ी 500 से अधिक सड़कों की हालत ऐसी हो गई है कि वह चलने के काबिल भी नहीं रह गई है। कई स्थानों पर तो सड़के ऐसे पास आउट हो चुकी है कि उसे देखकर यह पता भी नहीं चल पाता है कि यहां पहले सड़क भी थी। अभी दो दिन पहले आपदा सचिव का बयान आया था बंद पड़ी सड़कों में से 300 सड़कों को खोल दिया गया है। उनका यह भी कहना था की बारिश रुकते ही इन सड़कों के गढ्ढो को भरने का काम एक सप्ताह में पूरा कर लिया जाएगा। लेकिन क्या सड़कों के गड्ढे भरने से इसकी स्थिति ठीक हो जाएगी? इन गड्ढो को भरकर आने—जाने लायक ही बनाया जा सकता है इनकी मरम्मत या फिर पुनर्निर्माण के काम में कई महीने का समय लगेगा जो स्वाभाविक है। राज्य की सड़कों के लिए हर साल 1000 करोड़ का बजट खर्च किया जाता है। लेकिन इस साल पीडब्ल्यूडी विभाग को इस बजट का 25 फीसदी कम पैसा मिलेगा क्योंकि मानसूनी काल में दूसरी एजेंसियां 300 से 350 करोड़ पहले ही खर्च कर चुकी हैं। राज्य की अत्यंत ही बदहाल हो चुकी इन 300 से अधिक सड़कों को 7.5 सौ करोड़ में कितना ठीक किया जा सकेगा यह समय ही बताएगा। भूस्खलन और भूंधसाव की जद में आए दर्जनों गांव विस्थापन की बाट जोह रहे हैं। चमोली, टिहरी और नैनीताल के अनेक गांवों में भूस्खलन के कारण लोगों को विस्थापित किए जाने का इंतजार है। वही जोशीमठ सहित अन्य तमाम क्षेत्रों में भूस्खलन की समस्या के साथ—साथ भूंधसाव से भी लोगों को भारी खतरा बना हुआ है। यूं तो हर साल ही राज्य को मानसूनी आपदा से दो—चार होना पड़ता है तथा मानसून काल में जो नुकसान होता है उसकी भरपाई अगले मानसून तक भी नहीं हो पाती है। कोटद्वार की मालन नदी का जो पुल बीते साल बारिश में टूट गया था उसे अभी तक नहीं बनाया जा सका है। अब एक और मानसून काल गुजर गया यह पुल अगले मानसून काल तक बन सकेगा या नहीं कुछ कहा नहीं जा सकता है। उधर किसानो की कृषि भूमि और बागवानी को भी भारी नुकसान पहुंचा है। सैकड़ो हेक्टर जमीन हर साल नदियों के प्रवाह और अतिवृष्टि के कारण बह जाती है। सरकार द्वारा आपदा पीड़ितों को जो सहायता राशि दी जाती है अगर उसकी बात की जाए तो वह ऊंट के मुंह में जीरा जैसी ही कहीं जा सकती है। इन दिनों राज्य के कई जिलों में इसे लेकर आपदा प्रभावित लोग आंदोलन कर रहे हैं उनका कहना है कि आज के दौर में 40—50 हजार में क्या घर बन पाना संभव है? लेकिन सरकार तो मानकों के अनुसार ही सहायता दे सकती है। कुल मिलाकर इस मानसून काल में हुए नुकसान की भरपाई अगले मानसून काल तक भी हो सकेगी इसकी उम्मीद करना भी बेकार ही है।



